देखि पहुङ्क बिबाह माधुरी को इ धर इ ना थेह
प्रभु गौर के विवाह-समारोह की मधुरता को देखकर कोई भी शान्त नहीं रह पाता। शेष, शिव, ब्रह्मा, इन्द्र, गणेश और देवताओं के समूह के शरीर के रोंगटे अब खड़े हो गए हैं।
आकाश के मार्गों पर चलते हुए अनेक देवता अपने विमानों में आ रहे हैं। “जय! जय!” की ध्वनि हो रही है। मधुर वचन और सुन्दर भाव-भंगिमाएँ हैं।
देवता आनन्द से भरे हैं। आपस में वे प्रभु की मधुर लीलाओं की चर्चा करते हैं। वे फूलों की वर्षा करते हैं। किसी की दृष्टि में आए बिना वे सुन्दर ढंग से पृथ्वी पर उतर आते हैं।
ब्राह्मण सनातन मिश्र अपने सौभाग्य से अभिभूत होकर प्रभु गौर की प्रशंसा करते हैं। नरहरि दास की आशा है कि किसी दिन जब वह इन लीलाओं को देखेगा, तब उसका हृदय आनन्द से उन्मत्त हो उठेगा।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4