देखिते देखिते
निहारते-निहारते मैं अपनी इस स्थूल भौतिक पहचान को कब भूल जाऊँगी? कब मेरी आँखों के सामने व्रज-पुर की वह नित्य चिदानंदमयी शोभा प्रकट होगी?
मैं राजा वृषभानु की नगरी में जन्म लूँगी, यावट-पुर में मेरा विवाह होगा। व्रज-गोपी का भाव ही मेरा स्वभाव बन जाएगा, कोई अन्य भाव शेष नहीं रहेगा।
श्री राधा की कृपा के बल से मैं कब अपना सिद्ध शरीर, अपना सिद्ध नाम, अपना रूप, अपने वस्त्र और अपना कृष्ण-प्रेम पाऊँगी?
यमुना का जल भरने जाते हुए मैं युगल की रस-लीला को समझूँगी। प्रेम में विमुग्ध होकर, पगली के समान, मैं राधा की महिमा गाऊँगी।