Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ए धनि आञ्चरे बदन झाम्पाँअ

ए धनि आञ्चरे बदन झाम्पाँअ लुबधल मधुपचकोर बिधुन्तुद आनत आनत चलि याँअ
अर्थ

यह सुन्दरी अपने आँचल के छोर से अपना मुख ढक लेती है, क्योंकि भ्रमर, चकोर और राहु तीनों ही उस चन्द्रमुख को देखकर लालायित हो उठे हैं। वह बार-बार झुकती हुई आगे बढ़ती जाती है।

मुख-मण्डल कियेशारद सरोरुह भालहि अष्टमीक चन्द मधुरिपु मरमभरम याहा ऐछन तारे कि गणिये मति मन्द
अर्थ

क्या उसका मुख-मण्डल शरद ऋतु का कमल है, या उसका भाल अष्टमी का चन्द्रमा है? ऐसे रूप को देखकर स्वयं मधुरिपु भी हृदय से मोहित हो जाते हैं, फिर एक मंदबुद्धि व्यक्ति भला उसे कैसे आँक सकता है?

जनि कह गरबे पाणि-तले बारब ए थल-कमल उजोर तहि नख-चान्दभरम भरे ऐछन ततहिं पडत जनि भोर
अर्थ

अभिमान से यह मत कह कि तू उसके इस दैदीप्यमान भूमि-कमल को अपनी हथेली से ढक सकता है। उसके चन्द्रमा-सम नखों की माया इतनी सघन है कि जो भी प्रयास करता है, वह वहीं मोहित होकर भ्रमित रह जाता है।

भाँअ धनुया कियेसुतनु धुनायसि यछु शरे गिरिधर काम्प से किये अतनु पतग शिरे डारसि गोबिन्द-दास हिये ताप
अर्थ

हे सुडौल अंगोंवाली, क्या तू अपनी भौंहों का धनुष खींच रही है, किस बाण से तू गिरिधारी को भी थरथरा रही है? क्या तू उनके सिर पर साक्षात् अनंग कामदेव का ही बाण चला रही है? गोविन्द दास का हृदय यह देखकर जल उठता है।

इस भजन के बारे में

पद
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