ए धनि आञ्चरे बदन झाम्पाँअ
यह सुन्दरी अपने आँचल के छोर से अपना मुख ढक लेती है, क्योंकि भ्रमर, चकोर और राहु तीनों ही उस चन्द्रमुख को देखकर लालायित हो उठे हैं। वह बार-बार झुकती हुई आगे बढ़ती जाती है।
क्या उसका मुख-मण्डल शरद ऋतु का कमल है, या उसका भाल अष्टमी का चन्द्रमा है? ऐसे रूप को देखकर स्वयं मधुरिपु भी हृदय से मोहित हो जाते हैं, फिर एक मंदबुद्धि व्यक्ति भला उसे कैसे आँक सकता है?
अभिमान से यह मत कह कि तू उसके इस दैदीप्यमान भूमि-कमल को अपनी हथेली से ढक सकता है। उसके चन्द्रमा-सम नखों की माया इतनी सघन है कि जो भी प्रयास करता है, वह वहीं मोहित होकर भ्रमित रह जाता है।
हे सुडौल अंगोंवाली, क्या तू अपनी भौंहों का धनुष खींच रही है, किस बाण से तू गिरिधारी को भी थरथरा रही है? क्या तू उनके सिर पर साक्षात् अनंग कामदेव का ही बाण चला रही है? गोविन्द दास का हृदय यह देखकर जल उठता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
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