एइ त व्र्न्दवन पथे
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
यह वही वृन्दावन वन का मार्ग है, जिससे होकर हम दिन-प्रतिदिन आते-जाते हैं।
तू यहाँ हाथ फैलाकर सोना माँग रहा है, तू कौन है? क्या यहाँ कोई भी नहीं जो हमें तेरा नाम तक बता सके?
तुझे इस रूप में देखकर हम और पूछते हैं, कन्हाई हमसे किस प्रकार का चुंगी-कर चाहता है?
हम तो साथ में केवल घी की टोकरियाँ ही लिए जा रही हैं, फिर इस पर इतना बड़ा हंगामा क्यों?
तू तो आखिर व्रज का युवराज है, फिर ऐसा अनुचित काम करने पर क्यों उतर आया है?
अपनी हँसी-ठिठोली अब छोड़ दे, ऐसा गोविन्द दास कहते हैं।