गाइते गाइते नाम कि दशा होइलो
नाम गाते-गाते मेरी यह कैसी दशा हो गई! मेरे हृदय में यह प्रकट हुआ: 'मैं श्रीकृष्ण का नित्य दास हूँ।'
मैंने समझ लिया कि इस जड़ जगत में माया के जाल में फँसकर तथा गोविन्द के वियोग में, मैं अनेक प्रकार से दुःख भोग रहा हूँ।
इस संसार में मुझे फिर कुछ भी अच्छा नहीं लगा। 'मैं कहाँ जाऊँ, कृष्ण के दर्शन कैसे हों?' यही सोचकर मुझे बड़ी चिन्ता होने लगी।
रोते-रोते मेरी आँखों से आँसुओं की धार बहने लगी, जैसे मेरी आँखों में वर्षा की मूसलधार उतर आई हो।
मेरे लिए एक क्षण भी सौ युगों के समान हो गया। गोविन्द के वियोग को सहने की मुझमें कोई शक्ति नहीं है।
चारों ओर सारी पृथ्वी को मरुभूमि के समान देखकर मेरा प्राण उदासीन हो गया है। मैं स्थिर नहीं रह पाता, यही सोचता रहता हूँ कि क्या करूँ, क्या करूँ, और अब मेरा जीवन भी नहीं टिकता।
हे व्रजवासियो! मेरे प्राण बचा लो, मुझे श्री राधानाथ के दर्शन करा दो। भक्तिविनोद की यह विनती मानकर उसे अपने संग ले लो।
श्रीकृष्ण के वियोग को सहने की मुझमें अब शक्ति नहीं है। दो-चार दिनों में ही मैं यह प्राण त्याग दूँगा।
उस युगल-धन (राधा-कृष्ण) को देखकर मेरा मन अस्थिर हो गया। फिर मेरी चेतना ही लुप्त हो गई। कितना समय बीता, मुझे नहीं पता; जब मुझे चेतना लौटी, तब वह दर्शन जा चुका था।
हे सखी! मैं अपने प्राण कैसे थामूँ? एक क्षण भी मुझे युग के समान लगने लगा है।
मेरी आँखों से सावन की धार जैसे आँसू बरस रहे हैं, सारी धरती मुझे शून्य-सी लगती है। गोविन्द के वियोग में प्राण नहीं टिकते, बताओ, मैं कैसे जीऊँ?
व्याकुल होकर भक्तिविनोद फिर से नाम की शरण लेते हैं। वे पुकारते हैं: 'हे राधानाथ! मुझे अपने दर्शन दो, मेरे प्राण बचा लो, ऐसा न हो कि मैं मर जाऊँ।'