गौराङ्ग बिहरइ परम आनन्दे
परम आनन्द से भरे भगवान गौरांग अनेक लीलाएँ करते हैं। नित्यानन्द और भक्तों के समूह के साथ वे गंगा के तट पर “हरि! हरि!” बोलते हैं।
उनका गौर रूप नए पुखराज को भी हरा देता है। प्रेम की लहरों में खेलते हुए वे डुबकी लगाते हैं और फिर ऊपर उभर आते हैं। उनके गले में नए फूलों की अनुपम माला इधर-उधर झूलती है। वे नरहरि के शरीर पर टेक लगाए हुए हैं।
अपने परम प्रिय गदाधर का बायाँ हाथ पकड़कर वे अपने गुण गाते हैं, अर्थात् भगवान गोविन्द के गुण गाते हैं। उनका शरीर प्रेम के भाव से भर उठा है। उनके शरीर के रोम खड़े हो गए हैं। वे सिंह की तरह गर्जना करते हैं।
अगले ही क्षण वे हल्का-सा मुस्कुराते हैं। उनकी लाल आँखों के कोने की चितवन में कौन-सी अभिलाषा चमक रही है? उन्हें अचानक वृन्दावन की अपनी सारी लीलाएँ याद आ जाती हैं। आह, अब वासुदेव घोष क्या कहे?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- कामोद राग
- पद
- 4