सङ्कीर्तने नित्यानन्द नाचे
अपने प्रिय पार्षदों को पास लिए हुए भगवान नित्यानन्द संकीर्तन में नाचते हैं।
गोविन्द और माधव घोष गाते हैं। उनके गीत सुनकर चकित हुए श्रोता अपनी साँस रोक लेते हैं।
पतित जीवों के गले में बाँहें डालकर दयालु भगवान नित्यानन्द रोते हैं।
रुँधी हुई वाणी में वे पतित जीवों से बोलते हैं। उन्हें सुनकर पत्थर भी टूट जाते हैं।
वे सबको कसकर गले लगाते हैं। उनकी आँखों से प्रेम के आँसुओं की धाराएँ बहती हैं।
वे सबके भविष्य में जो भी अमंगल प्रतीक्षा कर रहा है, उसे नष्ट कर देते हैं। तरह-तरह के बहानों से वे लोगों को दिव्य प्रेम देते हैं।
जो कोई उनके चन्द्रमा जैसे मुख को देख लेता है, भगवान नित्यानन्द उसके गले पर अपनी बाँह रखकर रोने लगते हैं।
भगवान नित्यानन्द की कृपा को याद करके वासुदेव घोष अभिभूत हो जाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- श्री राग
- पद
- 8