गौरसुन्दर परम शुभ क्षणे धरल यज्णोपबीत
अत्यन्त शुभ क्षण में तरुण भगवान् गौरसुन्दर ने यज्ञोपवीत (पवित्र जनेऊ) धारण किया। वैदिक कर्मों में निपुण शची और जगन्नाथ मिश्र ने वह अनुपम संस्कार सम्पन्न किया।
अनेक मंगल-कर्म हुए। साध्वी स्त्रियों ने “उलु-लु-लु-लु-लु-लु!” की मंगल-ध्वनि की। भाट कवियों ने भगवान् गौरसुन्दर की महिमा के सुन्दर कवित्त सुनाए। हर आँख भगवान् गौरसुन्दर की शोभा से भर गई।
गायकों ने गाया। मरुज आदि ढोलों पर वादकों ने आनन्द से नौ तालों में बजाया। नर्तकों ने नृत्य किया और उनके पैरों से ध्वनि निकली, “धाधि! धिकध! धिलंग!”
देवताओं के हृदय आनन्द में मग्न हो गए और वे भगवान् गौरसुन्दर की मनोहर लीलाओं को निहारने लगे। “जय! जय!” की ध्वनि सब लोकों में भर गई। अब नरहरि दास भगवान् गौरसुन्दर की पूजा करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4