बल्लभ दुहिता लक्ष्मी सु चरिता
अपनी सखियों के साथ और चारों दिशाओं में सावधानी से देखती हुई वल्लभ आचार्य की साध्वी पुत्री लक्ष्मीप्रिया स्नान करने के लिए गंगा के तट की ओर जा रही हैं।
कुछ दूर पर भगवान् गौरांगचन्द्र को देखकर वे भीतर छिपे प्रेम से भर उठती हैं। उनके रूप की मधुरता का अमृत पीकर वे शान्त नहीं रह पातीं।
गुणों के रत्नों से भरी हुई अपनी प्रिया लक्ष्मीप्रिया को पहचानकर भगवान् गौर उनकी ओर देखते हैं। लक्ष्मीप्रिया का सुन्दर शरीर शुद्धतम सोने को भी जीत लेता है। भगवान् की वह दृष्टि उनके हृदय में प्रवेश कर जाती है।
दोनों एक-दूसरे को आँखों के कोनों से देखते हैं। उन्हें एक-दूसरे के सिवा और कुछ सूझता नहीं। मधुर-मधुर मुस्कुराते हुए नरहरि के स्वामी आनन्द से अपने घर की ओर चल पड़ते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4