गोराचन्देर बिबाह पर दिने
भगवान् गौरचन्द्र के विवाह के अगले दिन की भोर में घर में कितना आनन्द उमड़ पड़ता है?
चारों दिशाओं से साध्वी कन्याएँ दौड़ती हैं। वर और वधू की शोभा को निहारकर उनकी आँखें शीतल आनन्द से भर जाती हैं।
वल्लभ आचार्य की भाग्यशाली पत्नी को ऐसा दामाद-रत्न कैसे मिला? वे स्वयं नहीं जानतीं।
साधु-स्वभाव और उदार वल्लभ आचार्य को ऐसा मंगलमय दामाद कैसे मिला? वे नहीं जानते।
विवाह-संस्कार पूरा हो जाने पर वल्लभ आचार्य के दामाद बने भगवान् गौर-हरि आनन्दित हुए।
अब विवाह का कार्य पूरा हो गया है। नरहरि कहता है: अब सब देवता वल्लभ आचार्य की प्रशंसा करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6