हरि हरि! आर कि एमन दशा हब (छाडिया पुरुष देह)
हे हरि! हे हरि! क्या मुझे कभी ऐसी दशा मिलेगी? कब मैं यह पुरुष-देह छोड़कर प्रकृति, यानी गोपी बनूँगी और युगल के अंगों पर चन्दन लगाऊँगी?
कब मैं उनकी चूड़ा कसकर बाँधूँगी और उसे नई गुंजा-मालाओं से घेरूँगी? कब तरह-तरह के फूलों का हार गूँथकर पहनाऊँगी? कब सखियों के साथ मिलकर उन्हें पीले वस्त्र पहनाऊँगी और उनके मुख में पान दूँगी?
कब मैं उन दोनों के मनोहर रूप को जी भरकर देखूँगी और श्रीराधा को नीले वस्त्रों से सजाऊँगी? कब नए रत्नों की जरी लाकर उनकी सुन्दर वेणी बाँधूँगी और उसमें मालती के फूल गूँथूँगी?
मेरे मन में यही अभिलाषा है कि उस रूप-माधुरी को जी भरकर देखूँ। श्रीरूप और श्रीसनातन की जय हो! मुझे यही धन दीजिए। नरोत्तम दास यही निवेदन करता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरोत्तम दास ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- प्रार्थना
- भाव
- पद
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