जगन्नाथ मिश्र महा सुखे
जगन्नाथ मिश्र प्रसन्न होकर पुत्र को गोद में बैठाकर उसके चन्द्रमा जैसे मुख को चूमते हैं।
वे बड़े यत्न से पुत्र के केशों को सजाते हैं। उनका हृदय स्नेह से उमड़ पड़ता है।
फिर अपनी इच्छा का इशारा करके नन्हे निमाई पिता की गोद से सरककर नीचे उतरते हैं और आँगन में चले जाते हैं।
वे हाथों और घुटनों के बल चलते हुए आँगन में घूमते हैं। उनके सुन्दर चरणों में सोने के नूपुर झंकार करते हैं।
घुटनों के बल चलते हुए शिशु मुड़कर देखते हैं। जगन्नाथ मिश्र खड़े होकर उनकी चाल की मधुरता को निहारते हैं।
पिता के सामने आकर शिशु कहते हैं, “माँ!” पिता उन्हें उठाकर गोद में बैठाते हैं और उनके शरीर से धूल झाड़ते हैं।
फिर पिता बालक को उनकी माँ के हाथों में सौंप देते हैं। धीरे-धीरे हँसते-हँसते बालक माँ की गोद में खड़े हो जाते हैं।
उनके दाँतों की चमक दूध की बूँदों जैसी है। जब वे मुस्कुराते और हँसते हैं, तब कौन शान्त और उदासीन रह सकता है?
पुत्र के रूप को आँखों से पीती हुई माँ ने अपने को सदा आनन्द के सागर में तैरता हुआ अनुभव किया।
माँ की गोद में वह बालक शोभायमान और महिमामय है। नरहरि उस बालक की पूजा करते हैं, जो सारे संसार का मन मोह लेता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 10