कबे मोर शुभ दिन होइबे उदोय
मेरा शुभ दिन कब उदय होगा? कब वृन्दावन-धाम मेरा आश्रय बनेगा?
मेरी विषय-वासनाएँ कब मिटेंगी? संसार की ज्वाला कब बुझेगी? वैष्णवों के संग से मेरी कामना कब पूरी होगी?
कब मैं हरि-संकीर्तन में उन्मत्त होकर धूल में लोटूँगा, और धूल से धूसर होकर वैष्णवों के चरणों में पड़ा रहूँगा?
कब यमुना के तट पर कदंब वन में हृदय की आँखों से युगल-रूप का दर्शन करूँगा?
कब कोई सखी कृपा करके मुझे अपने चरणों में रखकर युगल-सेवा में नियुक्त करेगी?
कब युगल-लीला का दर्शन करते हुए, प्रेमानंद से अभिभूत होकर, मैं अचेत हो जाऊँगा?
कितने क्षण तक मैं अचेत पड़ा रहूँगा? कब मैं अपनी देह को भूल जाऊँगा?
चेत में लौटकर मैं फिर उस कृष्ण-लीला का स्मरण करूँगा जो मैंने अचेत अवस्था में देखी थी, और आँखों के जल में बह जाऊँगा।
कब मैं वैष्णवों की सभा में रुँधे गले से विनती करके कहूँगा, 'इस दुर्जन को भक्ति की एक बूँद दे दो'?
भक्तिविनोद हर क्षण श्री अनंग-मंजरी के चरणों की शरण पाने की आशा करते हैं।