कलि तिमिराकुल अखिल लोक देखि
सब लोगों को कलियुग के अँधेरे में खोया हुआ देखकर भगवान चैतन्य ने इस संसार में अपने मुख-चन्द्र को उदित किया। जब इस जगत् की आँखों ने उस चन्द्रमा की अमृतमयी चाँदनी, दिव्य प्रेम की चाँदनी, का आस्वादन किया, तब सबको अनुभव हुआ कि उनके जलते हुए दुःख नष्ट हो गए हैं।
करुणा के सागर भगवान गौर इस संसार में अवतरित हुए। अपने ही पवित्र नामों के चिन्तामणि रत्नों को लेकर उन्होंने एक बहुत बड़ा हार गूँथा, और वह हार उन्होंने इस जगत् के लोगों को पहना दिया।
भगवान चैतन्य ने अपने भक्तों के चरण-रूपी कल्पवृक्ष के नीचे विश्राम का स्थान बनाया। वहाँ आश्रय लेकर इस संसार में यात्रा करने वाले जीव अपनी सब कामनाएँ पूर्ण पाते हैं।
दिव्य प्रेम के राजसी हाथी ने उन भक्तों को, जिनके लिए कृष्ण ही एकमात्र धन हैं, उठाकर भगवान कृष्ण की लीलाओं में पहुँचा दिया है। केवल गोविन्द दास पीछे छूट गया है। जन्म-मृत्यु के इस संसार में रहकर वह विष की ज्वाला में जल रहा है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास
- पद
- 4