कि आर बोलिबो तोरे मन
हे मन, तुझसे और क्या कहूँ? तू मुख से 'प्रेम, प्रेम' कहता रहता है, परन्तु सच यह है कि तूने स्वर्ण को त्याग दिया है, और तेरी गठरी खाली ही बँधी रह गई है।
अभ्यास से आँसू बहाते हुए, अकारण उछलते-कूदते, तू मूर्छित होकर गिर पड़ता है। इस नाटकबाजी से तू लोगों को छलता है, दुष्ट संगति का प्रचार करता है, और स्त्री तथा धन के पीछे भागता है।
प्रेम प्राप्ति के साधन, अर्थात् साधन-भक्ति में तेरी कोई रुचि नहीं, तो शुद्ध प्रेम तुझे कैसे मिलेगा? दस अपराधों को त्यागकर सदा हरिनाम की भक्ति कर। जब नाम की कृपा होगी, तभी तुझे सच्चा प्रेम प्राप्त होगा।
तू न तो साधुओं की संगति में भगवान का सुभजन और संकीर्तन करता है, न ही एकान्त में उनका स्मरण करता है। वृक्ष पर चढ़े बिना ही फल को खींच-खींचकर पाने की चेष्टा करता है, इसलिए तुझे केवल बुरा फल ही मिला है।
सच्चा कृष्ण-प्रेम शुद्ध स्वर्ण के समान है, यह फल मनुष्य-लोक में अत्यन्त दुर्लभ है। जो तू कर रहा है, वह तो मात्र छलावा है। पहले उस प्रेम के योग्य पात्र बन, तब वह प्रेम तुझे सहज ही प्राप्त हो जाएगा।
हे भाई, देख, काम और प्रेम के बाहरी लक्षणों में कोई अन्तर नहीं दिखता, फिर भी काम कभी प्रेम नहीं बन सकता। तूने वस्तुतः काम को ही चुना है, और मिथ्या रूप से उसे 'प्रेम' का नाम दे दिया है। ऐसा करने से कल्याण कैसे हो सकता है?