किये हम पेखलुँ कनक पुतलिया
मैं यह क्या देख रहा हूँ? क्या मैं शची के आँगन में नाचती हुई सोने की पुतली देख रहा हूँ, धूल से सनी हुई सोने की पुतली?
उनके लालिमा-भरे चरण-कमल सूर्य से भी अधिक तेजोमय हैं। उनकी पायलों की झंकार को शची साफ सुनती हैं।
वासुदेव घोष कहते हैं: भगवान गौर की बाल-लीलाओं को देखने का अमृत चखकर नदिया के लोग धन्य हैं। नवद्वीप के लोग तो विशेष रूप से धन्य हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- बेलोयार राग, दशकोशी
- पद
- 4