नदीयार अति पुण्यबती पति
नदिया की सती-साध्वी स्त्रियों का मन कहाँ दौड़ता है? अपने बच्चों की ओर नहीं। हर क्षण वे स्त्रियाँ शची के पुत्र की ही चर्चा करती हैं।
भोर में बिछौने छोड़कर वे तिल के आधे भर समय के लिए भी शान्त नहीं रह पातीं। तरह-तरह की भेंटें थालों में भरकर वे नदिया के चन्द्रमा जैसे बालक गौर को देने के लिए जल्दी-जल्दी चल पड़ती हैं।
शची के घर में प्रवेश करते ही उनके हृदयों में आनन्द के कितने ही सागर उमड़ पड़ते हैं। माँ की गोद में खेलते हुए बालक गौर उन्हें अपने दर्शन देते हैं। ये गौर वास्तव में स्वयं भगवान कृष्ण हैं, गोकुल के चन्द्रमा कृष्ण।
इन स्त्रियों के लिए बालक गौर प्राणों के समान हैं। वे उनकी आँखों को शीतल आनन्द देते हैं। उन्हें गोद में लेकर स्त्रियाँ अपने शरीर को भूल जाती हैं। नरहरि कहते हैं: आह! आह! आह! क्या कभी मैं भी बालक गौर से वैसा प्रेम कर पाऊँगा जैसा ये महान भक्त करती हैं?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4