नाचे आरे बाप बिश्वम्भर
अहा! बालक विश्वम्भर नाच रहे हैं। स्त्रियाँ उनके हाथ में खाने के लिए उत्तम मक्खन और दूध रखती हैं।
सती-साध्वी स्त्रियाँ चारों ओर से उन्हें घेर लेती हैं। वे निमाईचन्द्र से कितने मधुर वचन बोलती हैं?
सब मिलकर उन्हें घेरकर स्त्रियाँ जोर-जोर से ताली बजाती हैं। “हरि! हरिबोल!” वे बार-बार गाती हैं।
माँ की ओर देखकर बालक गौर भी गाते हैं, “हरिबोल!” वे अनेक प्रकार से सुन्दर ढंग से नाचते हैं।
उनके चन्द्रमा जैसे मुख पर मृदु मुस्कान खिलती है, ऐसी मुस्कान जो सब लोकों पर बरसने वाली अमृत की बाढ़ है।
उनकी चंचल आँखें सुन्दर दृष्टि डालती हैं। उनकी भुजाएँ सुन्दर ढंग से हिलती हैं। उन्हें देखकर कौन शान्त रह सकता है?
उनके अंगों से चमकती हुई अति मधुर शोभा की किरणें आँगन को भर देती हैं।
उनकी करधनी और नूपुर झंकारते हैं। नरहरि उनके चरणतल की पूजा करते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 8