निर्बेद बिषाद मद दैन्य ग्लानि श्रमोन्माद
कुछ लक्षण उमड़ते हुए प्रेम को प्रकट करते हैं। इन्हें व्यभिचारी भाव कहते हैं, और ये तैंतीस गिने गए हैं: निर्वेद, विषाद, मद, दैन्य, ग्लानि, श्रम, उन्माद, गर्व, त्रास, शंका, अपस्मृति, आवेग, आलस्य, व्याधि, मोह, मृत्यु, जड़ता, व्रीड़ा (लज्जा), अवहित्था (भाव छिपाना) और स्मृति।
इसी सूची में आगे ये हैं: वितर्क, चपलता, मति, चिन्ता, उत्सुकता, हर्ष, धृति, उग्रता, आलस्य, अमर्ष (असहनशीलता), निद्रा, सुप्ति (गहरी नींद) और बोध (जागना)। ये सब भाव मिलकर तैंतीस व्यभिचारी भाव कहलाते हैं।
उग्रता और आलस्य इस अनुपम मधुर-रस को कभी स्पर्श नहीं करते। परन्तु अन्य सभी भाव उचित अवसर पर मधुर-रस में सहज ही आनन्दपूर्वक विद्यमान रहते हैं।
ये सभी भाव स्थायी भाव के सागर में उठने वाली लहरों के समान हैं। वे अपना कार्य शीघ्र पूर्ण करके सागर को भर देते हैं, और फिर कहीं दिखाई नहीं देते।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गीतमाला
- भाव
- पद
- 4