र इ हे अब तेजह मन
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
हे राधे, अब अपना यह मान त्याग दो। कृष्ण तुम्हारे चरणों में गिरकर विनती कर रहे हैं।
अपने मुख की शोभा खोकर उसे मलिन मत होने दो। क्या पूर्णिमा का चाँद कभी धुँधला होकर उगता है?
बंधूली पुष्प-से लाल तुम्हारे अधर और तुम्हारी मधुर मुस्कान को लंबी, भारी आहों से उदास मत करो।
तुम्हारे चंचल नेत्र खंजन पक्षियों के जोड़े समान हैं। उनके सामने भौंहों के बल का कुंडलित सर्प मत रहने दो।
मुझ पर इतना क्रोध करने से क्या लाभ? मेरे दोष तो सारे संसार को पहले से ही ज्ञात हैं।
तुम्हारे वचनों के अमृत बिना कोई जीवित नहीं रह सकता। फिर मुझे अपने मान की यह वज्र-सी कठोरता क्यों दिखा रही हो?
गोविन्द दास अपने हृदय में बस यही एक आशा संजोए हैं, कि तुम्हारे मन की यह मान-अभिलाषा अंततः त्याग दी जाए।