रजनी प्रभाते शची देबी चिते आनन्देर नाहि ओर
सूर्योदय के समय शची के हृदय में आनन्द का कोई अन्त नहीं है। पुत्र का मुख देखते हुए उनकी आँखों से इतने आँसू बहते हैं कि वे देख नहीं पातीं।
सीता के चरण पकड़कर वे बड़े यत्न से मधुर वचन कहती हैं। वे कहती हैं, “मुझे आप पर पूरा विश्वास है। आप भली और सज्जन हैं। मैं आपके बारे में कुछ भी बुरा नहीं जानती।”
सीता कहती हैं, “मैं आपको भली-भाँति जानती हूँ। निमाईचन्द्र सदा शुद्ध रहें। वे दीर्घायु हों। वे सदा सुखी रहें। ये आशीर्वाद मैं दूँगी।”
शची कहती हैं, “मैं अपने लिए कोई आशीर्वाद नहीं माँगूँगी। मैं कितने आशीर्वाद माँगूँगी? मेरी प्रार्थना है कि आप यह आशीर्वाद दें कि मेरे पुत्र की आँखों के तारे घर में शान्ति से रहें। मैं उसकी चंचलता की बड़ी बाढ़ को नष्ट कर दूँगी।”
“निमाई मेरा जीवन और प्राण है। केवल मेरा विश्वरूप ही उसके समान है। वह मुझसे तिल भर समय के लिए भी अलग न हो। कृपया मुझे यह वरदान दीजिए।”
इस प्रकार कितनी ही बातें कही जाती हैं। फिर शीघ्र ही मंगल-विधि सम्पन्न की जाती है। नरहरि के पास केवल एक ही मुख है। वह माता शची के भगवान गौर के प्रति अनुपम प्रेम का वर्णन कैसे कर सकता है?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 6