श्रीबास बनिता अति सु चरित स्नेहेर मूरति येन
इस संसार में श्रीवास की पत्नी जैसी कोई पतिव्रता सती स्त्री नहीं है। वे सदा लज्जाशील और सच्चरित्र हैं, और दिव्य प्रेम की साकार मूर्ति जैसी हैं।
उनका अनुपम शरीर प्रसन्नता से खिल उठा है। उनका मुख वस्त्र से आधा ढका हुआ है। सीता के पास खड़ी होकर वे उस छोटे बालक को निहारती हैं जो उनके हृदय को आनन्द देता है।
अपने प्रिय साथियों से घिरे बालक गौर आँगन में खड़े हैं। उनके मुख का सुन्दर चन्द्रमा चमक रहा है। उनके अंग सोने की तरह दमक रहे हैं।
वे नये-नये फूलों की मालाओं से सजे हैं। वे शोभा के सागर में तैर रहे हैं। नरहरि दास पर उनके प्रति अद्भुत प्रेम की एक बड़ी विपत्ति टूट पड़ी है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4