रसबति रध रसमयि कन
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
राधा रस की मूर्ति हैं, कृष्ण रस के मूर्तिमान स्वरूप हैं। कौन जान सकता है, मुझे बताओ, तुम्हारे हृदय में क्या है?
तुम इतने क्रोधित होकर भी मुँह मोड़कर अलग नहीं बैठे। तुम दोनों वृन्दावन के वन में गहरे प्रवेश कर गए हो।
क्या कहूँ, हे सखी! बोलते-बोलते ही हँसी आ जाती है, इन दोनों की लीला कितनी अद्भुत है, कितनी अद्भुत है!
उनके नेत्र प्रेम से भारी होकर एक-दूसरे की राह निहारते रहे, और वे कुंज-वन के गहन अंधकार तक जा पहुँचे।
जब दोनों से पूछा गया कि वे कहाँ जा रहे हैं, तो दोनों का मन टाल-मटोल करने लगा। दोनों ने बस अपनी-अपनी सखी का नाम ले दिया।
उलझन में उन्होंने हृदय के भेद छूने वाले शब्द कह डाले। उनकी सखियाँ समझ गईं कि अब दोनों एक-दूसरे के आलिंगन में समा चुके हैं।
जब दोनों मिलकर एक-दूसरे को आलिंगन में ले चुके, तो गोविन्द दास कहते हैं, फिर वहाँ क्या हुआ, यह कौन बता सकता है!