रसेर आधार जिनि ताँर चित्ते रस खनि
जिसका हृदय रसों का भण्डार है, रसों की रत्न-खान है, उसके हृदय में पहले श्रद्धा जागती है। फिर एक-एक करके निष्ठा, रुचि और आसक्ति आती हैं। इस तरह उसमें भाव प्रकट होता है, जिसे रति कहते हैं।
स्थायी भाव अपने अनुकूल (अविरुद्ध) और प्रतिकूल (विरुद्ध), दोनों प्रकार के भावों पर अपना प्रभाव प्रकट करके उन्हें अपने वश में कर लेता है। वह सबका आदि-स्वामी बन जाता है और परम शोभा को प्राप्त होता है। रस में यही सुंदर भाव 'स्थायी भाव' के नाम से जाना जाता है।
रस दो प्रकार के होते हैं, मुख्य और गौण। मुख्य रस पाँच हैं और गौण रस सात हैं। पाँच मुख्य रस ये हैं: शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य।
सात गौण रस ये हैं: हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और बीभत्स। ये सभी सुंदर हैं और कृष्ण-भक्ति से भरे हुए हैं।