Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा

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साधारणि समञ्जसा स्थायी लाभे भाब दशा कुब्जा आर महिषी प्रमाण एक ब्रज-देबी-गणे महा-भाब सङ्घटने रूढ अधिरूढ सु-बिधान
अर्थ

कुब्जा और द्वारका की रानियाँ क्रमशः साधारणी स्थायी भाव और समंजसा स्थायी भाव के उदाहरण हैं। केवल व्रज की देवियाँ (गोपियाँ) ही महाभाव पाती हैं, जो दो प्रकार का है: रूढ़ और अधिरूढ़।

निमेषासह्यता ताय हृन्-मथने खिन्न प्राय कल्प खण सौख्ये शङ्काकुल आत्माबधि बिस्मरण खण कल्प बिबेचन जोगे बा बिजोगे समतुल
अर्थ

रूढ़ महाभाव के लक्षण ये हैं: पलक झपकना भी असहनीय लगना, हृदय का मन्थन होकर व्यथित होना, एक कल्प को क्षणभर जैसा अनुभव करना, सुख में भी भविष्य के कष्ट की शंका बनी रहना, स्वयं को भी भूल जाना, और एक क्षण को कल्प जैसा दीर्घ अनुभव करना।

अधिरूढ भाबे पुनः द्वि-प्रकार भेद शुन मोदन मादन नामे ख्यात बिश्लेष दशाते पुनः मोदन होय मोहन दिब्योन्माद ताहे होय जत
अर्थ

अधिरूढ़ महाभाव दो प्रकार का है: मोदन और मादन। कृष्ण से वियोग की स्थिति में मोदन ही परिवर्तित होकर मोहन का रूप ले लेता है, और तब दिव्योन्माद प्रकट होता है।

दिब्योन्माद द्वि-प्रकार चित्र-जल्पोद्घूर्ण आर चित्र-जल्प बहु-बिध ताय मोहनेते श्री-राधार मादनाख्य दशा सार नित्य-लीलामोयी भाब पाय
अर्थ

दिव्योन्माद दो प्रकार का है: चित्र-जल्प और उद्घूर्ण। चित्र-जल्प के भी कई भेद हैं। मोहन की अवस्था में ही श्रीराधा मादन नामक सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त होती हैं। ये उनकी नित्य-लीला के ही भाव हैं।

साधारणी धूमयिता समञ्जसा सदा दीप्त रूढे तथोद्दीप्त समर्थाय शुद्दीप्त श्री-राधा-प्रेम जेन उज्ज्वलित हेम मोदनादि भाबे सदा ताय
अर्थ

साधारणी प्रेम (जैसे कुब्जा का) धूमायित होता है। समंजसा प्रेम (जैसे द्वारका की रानियों का) दीप्त होता है। समर्था प्रेम (गोपियों का) रूढ़ महाभाव में उद्दीप्त होता है। और श्रीराधा का प्रेम सुदीप्त है, जो तपे हुए सोने की तरह चमकता है। इस प्रेम में मोदन आदि भाव सदा रहते हैं।