श्री उज्ज्वल रस सार स्वभाबतः द्वि प्रकार
उज्ज्वल-रस, जो समस्त रसों में सर्वश्रेष्ठ है, स्वभाव से दो प्रकार का है: विप्रलम्भ और सम्भोग। वियोग के बिना मिलन का सुख पूर्ण रूप से अनुभव नहीं होता। यही विप्रलम्भ का प्रयोजन है।
विप्रलम्भ चार प्रकार का है: पूर्वराग, मान, प्रवास और वैचित्त्य-ज्ञान। पूर्वराग वह प्रेम है जो प्रियतम से साक्षात् मिलने से पहले उन्हें देखने या उनके विषय में सुनने से उत्पन्न होता है।
मान में दोनों प्रेमी स्वेच्छा से एक-दूसरे से दूर रहते हैं और एक-दूसरे को देखना नहीं चाहते। यह मान किसी कारण से अथवा बिना कारण भी हो सकता है। मान में प्रकट होने वाला यह रोष वास्तव में प्रेम का ही एक रूप है। ये सब प्रेम की ही लीलाएँ हैं।
सहेतुक मान मधुर वचनों, हास-परिहास, पूजा, उपहार, चरण-वन्दन अथवा उदासीनता दिखाने से शान्त हो जाता है। निर्हेतुक मान सुन्दर स्थान, समय बीतने अथवा बाँसुरी की ध्वनि सुनकर बहुत शीघ्र शान्त हो जाता है।
प्रियतम से बिछुड़ने की आशंका से हृदय में प्रेम-वैचित्त्य उत्पन्न होता है। जब प्रियतम किसी दूसरे देश, गाँव या वन में चले जाते हैं, तो उस वियोग को प्रवास कहा जाता है।
इस भजन के बारे में
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- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
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