सजनि एत दिन बन्गल द्वन्द्व
AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित
हे सखी, इतने दिनों बाद यह संघर्ष टूट गया है; कान्हा के प्रेम के सर्प ने मुझे जकड़ लिया है; कुल-मर्यादा का मेंढक अब क्षीण और मंद स्वर में टर्राता है।
मेरे हृदय के मंदिर में कान्हा सो गए हैं; प्रेम का प्रहरी जागता रहे; मेरे बड़े-बुजुर्ग नगर के चोरों-से हो गए हैं, वे दूर, बहुत दूर भाग जाएँ।
मैं स्वयं अपना ही आचरण नहीं समझ पाती; एक करना चाहती हूँ और हो कुछ और जाता है; उस भाव से भरा मेरा मन अपने ही स्वजनों को छल देता है। मेरे पति और उनकी सौत तक को इसका पता नहीं।
निंदा भी अब मेरी आँखों को दिखाई नहीं देती; मुझे नहीं पता मेरी आँखों को क्या हो गया है; यह जो नशा मुझ पर छाया है, वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता; गोविन्द दास ही मेरे इकलौते साथी हैं।