सजनि एत दिने भाङ्गल द्वन्द्व
हे सखी, इतने दिनों बाद यह संघर्ष टूट गया है; कान्हा के प्रेम के सर्प ने कुल-मर्यादा के अभागे मेंढक को निगल लिया, और वह मर रहा है।
मेरे हृदय के मंदिर में कान्हा सो गए हैं; प्रेम का प्रहरी जागता रहे; मेरे बड़े-बुजुर्ग और पुरवासी चोरों-से हो गए हैं, वे दूर, बहुत दूर भाग जाएँ।
मैं स्वयं अपना ही आचरण नहीं समझ पाती; करना कुछ चाहती हूँ और हो कुछ और जाता है; उस भाव से भरा मेरा मन अपने ही स्वजनों को छल देता है। मेरे पति और मेरी सौत तक को इसका पता नहीं।
निंदा भी अब मेरी आँखों को दिखाई नहीं देती; मुझे नहीं पता मेरी आँखों को क्या हो गया है; यह जो नशा मुझ पर छाया है, वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता; गोविन्द दास ही मेरे इकलौते साथी हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 4