निताइ केबल पतित जनार बन्धु
भगवान निताई पतित जीव के एकमात्र मित्र हैं। अनेक पूर्व पुण्य कर्मों के फलस्वरूप कोई जीव भाग्य से भगवान नित्यानन्द से मिल जाता है। दरिद्रता के बीच उसे रत्नों का सागर मिल जाता है।
चारों दिशाओं में देखकर भगवान निताई “गौर राय!” पुकारते हैं और मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। प्रभु के साथी उन्हें घेर लेते हैं। भगवान निताई उन्हें गले लगाते हैं। उन्हें देखते हुए प्रभु अपने मुख-चन्द्र से बहते आँसुओं से उन्हें सींच देते हैं।
उनकी लाल आँखों के खंजन पक्षियों से प्रेम के आँसुओं की धाराएँ बहती हैं, ऐसी धाराएँ जैसे स्वर्णिम सुमेरु पर्वत से स्वर्ग की गंगा बह रही हो। गरजते बादल जैसे स्वर में वे बार-बार अपने भाइयों, अर्थात् भक्तों को पुकारते हैं। उनके पैरों के भार से पृथ्वी काँप उठती है।
दयालु भगवान निताई ने पतित जीवों को दिव्य प्रेम का दान दिया, ऐसा दान जिसके अस्तित्व तक का देवता ब्रह्मा को पता नहीं था। अपनी ही कृपा से भगवान निताई ने तीनों लोकों को उस प्रेम के उमड़ते अमृत की बाढ़ में बहा दिया। सब उस बाढ़ में बह गए। केवल वासुदेव घोष नहीं बहा। केवल वही उस अमृत से वंचित रह गया।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- वासुदेव घोष · जीवनी पढ़ें
- राग
- सिन्धुड़ा राग
- पद
- 4