शरद चन्द पवन मन्द
शरद का चंद्रमा चमक रहा है, मंद वायु बह रही है; वन पुष्पों की सुगंध से भरा है। चमेली, मालती तथा यूथिका के फूल खिले हैं, और उन पर मदमस्त भ्रमर मंडरा रहे हैं।
रात्रि की ऐसी शोभा देखकर श्याम-मोहन प्रेम-मद में मतवाले हो जाते हैं। उनकी बाँसुरी का गीत पंचम स्वर में गूँजता है, सती नारियों के हृदय हर लेता है।
उसे सुनकर गोपियों का प्रेम जाग उठता है, और वे मौन ही अपने हृदय में स्वयं को समर्पित कर देती हैं; वे वहीं जाती हैं जहाँ वह पुकारे, बाँसुरी की मधुर, गूँजती स्वर-लहरी जहाँ ले जाए।
जल्दबाजी में घर और अपनी देह की सुध तक छोड़कर, कोई गोपी एक ही आँख में काजल लगाए चल पड़ती है, कोई केवल एक पायल पहने, कोई केवल एक कुंडल झुलाती हुई।
कमरबंद ढीले पड़े, वे युवतियाँ शीघ्रता से दौड़ पड़ती हैं; उनके वस्त्र सरक जाते हैं, करधनी और चोली खुल जाती है, और खुली हुई वेणियाँ व्याकुलता से लहराती हैं।
वहाँ सब सखियाँ मिलकर एकत्र होती हैं, कोई किसी और की राह की परवाह नहीं करती; इस प्रकार वे गोकुल-चंद्र से मिलती हैं, ऐसा गोविन्द दास बताते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 6