सये किबा सेइ नयन चाहनि
अहा, उन नेत्रों की कैसी दृष्टि है! उनकी मुस्कान की एक झलक मात्र से मेरे जीवन की गुड़िया काँप उठती है, और मैं अपना यौवन उन पर न्योछावर कर देना चाहती हूँ।
उनके ललाट पर चंदन का चन्द्रमा स्त्रियों के मन को मोह लेने वाला फंदा है; उसने अंधेरे में उजाला कर दिया है। मानो काले बादल के ऊपर सोलहों कलाओं वाला पूर्ण चंद्रमा हर रात, हर दिशा में सदा उदित होता रहे।
उनकी शिखा की कैसी शोभा है! अनुपम बाँसुरी बजाते समय उनके दसों चन्द्र-से नख नाचते हैं। उस मुख को देखकर मन में जो आनंद भर जाता है, उसे जीते-जी मैं कैसे भूल सकती हूँ?
जो कुल-मर्यादा और लज्जा मुझे कभी प्रिय थी, वह उस सौंदर्य को एक बार देख लेने भर से ही सब लुप्त हो गई। इस प्रकार गोविन्द दास के हृदय में यही अभिलाषा है: नित्य-नवीन प्रेम का वह साक्षात् स्वरूप।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
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