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“हरे कृष्ण” के परिणाम

558 भजन · 980 पद भजन के शब्दों में · 802 पद अर्थ में

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1 पद भजन में 4 पद अर्थ में 6

श्री चैतन्य महाप्रभु · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं
    श्रेयः-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम्
    आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनं
    सर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्री-कृष्ण-सङ्कीर्तनम्
  • पद 1अर्थ
    श्री-कृष्ण-संकीर्तन की जय हो, जो हृदय पर वर्षों से जमी सारी धूल को धो देता है और बद्ध जीवन की, अर्थात् बार-बार जन्म-मृत्यु की महाभयंकर अग्नि को शान्त कर देता है। यह संकीर्तन आन्दोलन समस्त मानवता के लिए परम मंगलमय है, क्योंकि यह कल्याणकारी चन्द्रमा की किरणें…
  • पद 2अर्थ
    …प्रभु, आपका पावन नाम अकेला ही समस्त जीवों को सम्पूर्ण मंगल प्रदान कर सकता है, इसीलिए आपके कृष्ण और गोविन्द जैसे सैकड़ों-करोड़ों नाम हैं। इन दिव्य नामों में आपने अपनी समस्त दिव्य शक्तियाँ भर दी हैं। इन नामों के जप के लिए कोई कठोर नियम भी नहीं हैं। हे प्रभु…
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5अर्थ
    हे नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण, मैं आपका नित्य सेवक हूँ, फिर भी न जाने कैसे मैं जन्म-मृत्यु के इस भवसागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया मुझे इस मृत्यु-सागर से उठा लीजिए और अपने चरण-कमलों की धूलि के एक कण के समान मुझे स्थान दीजिए।
  • पद 8अर्थ
    मैं कृष्ण के अतिरिक्त किसी और को अपना स्वामी नहीं मानता, और वे सदा मेरे स्वामी ही रहेंगे, चाहे वे मुझे कठोरता से अपने आलिंगन में जकड़ें या अपने दर्शन न देकर मेरा हृदय तोड़ दें। वे जो चाहें वह करने के लिए पूर्णतः स्वतन्त्र हैं, क्योंकि वे सदा और निःशर्त रूप से…
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में 1

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    अनित्य सोंसार भाइ कृष्ण मात्र सार
    गोरा-शिखा मते कृष्ण भज अनिबार
  • पद 3भजन
    गोरार चरण धोरि' जेइ भाग्यबान्
    ब्रजे राधा-कृष्ण भजे सेइ मोर प्राण
  • पद 2अर्थ
    हे भाइयों! इस नाशवान संसार में कृष्ण ही एकमात्र अमृत हैं। चैतन्य महाप्रभु की शिक्षा के अनुसार सदा कृष्ण का भजन करो।
  • पद 3अर्थ
    जो भाग्यवान चैतन्य महाप्रभु के चरण पकड़कर व्रज में राधा-कृष्ण का भजन करता है, वही मेरे प्राण हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    राधा-कृष्ण गोराचन्द न'दे बृन्दाबन
    एइ मात्र कोरो सार पा'बे नित्य धन
  • पद 4अर्थ
    चैतन्य महाप्रभु राधा-कृष्ण से भिन्न नहीं हैं, और नदिया वृन्दावन से भिन्न नहीं है। इस अमृत तत्त्व को ही सार मानो, तुम्हें नित्य धन प्राप्त होगा।
2 पद भजन में 5 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रेम-भक्ति-चन्द्रिका

  • पद 4भजन
    सम स्नेहा बिषम स्नेहा ना करिह दूइ लेख
    कहि मात्र अधिक स्नेहा गण
    निरन्तर थाके सन्गे कृष्ण कथा लीला रन्गे
    नर्म सखी एइ साब जन
  • पद 12भजन
    कृष्ण स्मरन् जनं चास्य
    प्रेष्ठं निज-समीहितम्
    तत्-तत्-कथा-रतश् चासौ
    कुर्याद् वासं व्रजे सदा
  • पद 3अर्थ
    तुंगविद्या और इन्दुरेखा, ये आठ सखियाँ प्रमुख सखियाँ कहलाती हैं। ये श्री राधिका की सबसे प्रिय सहचरियाँ हैं और सदा गहरे प्रेम से राधा-कृष्ण की सेवा करती हैं। ये राधा-कृष्ण से अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़ी हैं।
  • पद 4अर्थ
    …यहाँ न गिनो। मैं केवल अधिक स्नेह वाली (अधिक-स्नेहा) सखियों का वर्णन करता हूँ। वे सदा राधा-कृष्ण के साथ रहती हैं और कृष्ण-कथा तथा उनकी लीला के आनन्द में डूबी रहती हैं। इन सभी को नर्म-सखी कहा जाता है।…
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6अर्थ
    इन सखियों का अनुगमन करते हुए मैं उनसे प्रेम-सेवा की भिक्षा माँगूँगा और उनके संकेत से ही सारी सेवाएँ समझ लूँगा। राधा-कृष्ण के रूप और गुणों से मैं सदा मोहित और अनुरक्त रहूँगा, और सखियों के बीच निवास करूँगा।
  • पद 7अर्थ
    वृन्दावन में राधा-कृष्ण दोनों के चारों ओर सखियाँ रहती हैं और समय पर आनंदपूर्वक सेवा करती हैं। सखी का संकेत मिलने पर मैं चामर डुलाऊँगा और उनके चन्द्रमुख में ताम्बूल दूँगा।
  • पद 12अर्थ
    साधक को सदा कृष्ण का स्मरण करना चाहिए, और कृष्ण के किसी प्रिय सेवक को, जो उसे अपने मन के अनुकूल लगे, चुनना चाहिए। उस सेवक और कृष्ण की प्रेम-कथाओं में लीन रहकर साधक को सदा व्रज में निवास करना चाहिए। यदि शरीर से व्रज जाना संभव न हो, तो मन से वहाँ निवास करना…
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 12

नरोत्तम दास ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    निताइ-पद-कमल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल
    जे छायाय् जगत जुराय्
    हेनो निताइ बिने भाइ, राधा-कृष्ण पाइते नाइ
    दृढ कोरि' धरो निताइर् पाय्
  • पद 3भजन
    अहङ्कारे मत्त होइया, निताइ-पद पासरिया
    असत्येरे सत्य कोरि मानि
    निताइयेर् कोरुणा हबे, ब्रजे राधा-कृष्ण पाबे
    धरो निताइ-चरण दु'खानि
  • पद 1अर्थ
    नित्यानन्द के चरण-कमल करोड़ों चन्द्रमाओं के समान शीतल हैं, जिनकी छाया से सारा जगत शान्ति पाता है। हे भाई, ऐसे नित्यानन्द के बिना राधा-कृष्ण को पाना सम्भव नहीं, इसलिए दृढ़तापूर्वक निताई के चरण पकड़ लो।
  • पद 3अर्थ
    अहंकार में उन्मत्त होकर निताई के चरणों को भूलकर, मनुष्य असत्य को ही सत्य मान लेता है। यदि निताई की कृपा हो जाए, तो व्रज में राधा-कृष्ण मिल जाते हैं, इसलिए निताई के दोनों चरण दृढ़ता से पकड़ लो।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 3भजन
    एकाकी आमार, नाहि पाय बल,
    हरि-नाम-सङ्कीर्तने
    तुमि कृपा कोरि', श्रद्धा-बिन्दु दिया,
    देहो' कृष्ण-नाम-धने
  • पद 4भजन
    कृष्ण से तोमार, कृष्ण दिते पारो,
    तोमार शकति आछे
    आमि तो' काङ्गल, 'कृष्ण' 'कृष्ण' बोलि',
    धाइ तव पाछे पाछे
  • पद 3अर्थ
    एकाकी मुझमें हरि-नाम के संकीर्तन का बल नहीं है। आप कृपा करके मुझे श्रद्धा की एक बूँद दे दें, जिससे मुझे कृष्ण-नाम का महान धन प्राप्त हो सके।
  • पद 4अर्थ
    कृष्ण आपके ही हैं, कृष्ण को देने की शक्ति आपमें है। मैं तो एक दीन भिखारी हूँ, कृष्ण कृष्ण पुकारते हुए आपके ही पीछे दौड़ता रहता हूँ।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 9

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रार्थना

  • पद 1भजन
    ठाकुर वैष्णव-पद अवनीर सु-सम्पद
    शुन भाई हञा एक मन
    आश्रय लैया भजे तारे कृष्ण नाहि त्यजे
    आर सब मरे अकारण
  • पद 4भजन
    वैष्णव-सङ्गेते मन आनन्दित अनुक्षन
    सदा हय कृष्ण-पर-सङ्ग
    दीन नरोत्तम कान्दे हिया धैर्य नाहि बान्धे
    मोर दशा केन हैल भङ्ग
  • पद 1अर्थ
    हे भाई, पूरे मन से मेरी बात सुनो। ठाकुर वैष्णवों के चरण-कमल इस पृथ्वी का सबसे बड़ा धन हैं। जो उनका आश्रय लेकर भजन करता है, उसे कृष्ण कभी नहीं छोड़ते। बाकी सब व्यर्थ ही मरते हैं।
  • पद 4अर्थ
    वैष्णवों की संगति से मेरा मन क्षण-क्षण आनंदित रहता है, और मैं सदा कृष्ण-भक्तों की संगति ही चाहता हूँ। दीन नरोत्तम दास रो पड़ते हैं और हृदय में धैर्य नहीं बांध पाते। मेरी यह दशा क्यों बिगड़ गई?
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 9

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश,
    निद्रा छारि' उठो जीव
    बोलो हरि हरि, मुकुन्द मुरारि,
    राम कृष्ण हयग्रीव
  • पद 8भजन
    जामुन-जीवन, केलि-परायण,
    मानस-चन्द्र-चकोर
    नाम-सुधा-रस, गाओ कृष्ण-जश
    राखो वचन मन मोर
  • पद 1अर्थ
    रात्रि समाप्त हो गई और प्रभात का प्रकाश प्रवेश कर रहा है। हे जीव! निद्रा त्यागकर उठ जाओ और हरि, हरि बोलो, मुकुंद, मुरारि, राम, कृष्ण, हयग्रीव।
  • पद 8अर्थ
    वे यमुना के जीवन हैं, सदा प्रेम-लीलाओं में लीन रहते हैं, और गोपियों के मन रूपी चकोर पक्षियों के लिए चंद्रमा के समान हैं। हे मन! मेरी यह बात मानो और अमृत रस से भरे इन नामों में कृष्ण की महिमा का गान करो।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    (एमोन् दोयाल् तो नाइ हे मार खेये प्रेम देय)
    (ओरे) अपराध दूरे जाबे पा'बे प्रेम-धन
    (ओ नामे अपराध-बिचार तो नाइ हे)
    (तखोन्) कृष्ण-नामे रुचि ह'बे घुचिबे बन्धन
  • पद 3भजन
    (कृष्ण-नामे अनुराग तो ह'बे हे)
    (तखोन) अनायासे स-फल ह'बे जीबेर जीबन
    (कृष्ण-रति बिना जीबन तो मिछे हे)
    (शेषे) बृन्दाबने राधा-श्यामेर पा'बे दरशन …
  • पद 2अर्थ
    (ऐसा दयालु और कोई नहीं है, मार खाकर भी वे प्रेम देते हैं।) (हे मन,) तेरे अपराध दूर हो जाएँगे, तुझे प्रेम का धन मिलेगा। (उनके नाम में अपराध का कोई विचार नहीं है।) (तब) कृष्ण-नाम में रुचि जगेगी, तेरा बंधन कट जाएगा।
  • पद 3अर्थ
    (हे मन, कृष्ण-नाम में तेरा अनुराग होगा।) (तब) जीव का जीवन सहज ही सफल हो जाएगा। (हे मन, कृष्ण-प्रेम के बिना जीवन व्यर्थ है।) (अंत में) तू वृंदावन में राधा-श्याम का दर्शन पाएगा। (यह तब होगा जब गौर की कृपा होगी।)
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 1भजन
    दुर्लभ मानब-जन्म लभिया सोंसारे
    कृष्ण ना भजिनु दुःख कहिबो काहारे
  • पद 13भजन
    अत एब माया-मोह छारि बुद्धिमान
    नित्य-तत्त्व कृष्ण-भक्ति कोरुन सन्धान
  • पद 1अर्थ
    दुर्लभ मानव-जन्म पाकर भी इस संसार में मैंने कृष्ण की भक्ति नहीं की, अपना यह दुख अब किसे कहूँ?
  • पद 13अर्थ
    इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति माया के इस मोह को त्यागकर नित्य सत्य कृष्ण की भक्ति की साधना करता है।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    मम मन मन्दिरे रहो निशि-दिन्
    कृष्ण मुरारि श्री-कृष्ण मुरारि
  • पद 6भजन
    बन्दन गाने तव बजुक् जीवन
    कृष्ण मुरारि श्री कृष्ण मुरारि
  • पद 1अर्थ
    हे कृष्ण मुरारि, श्री कृष्ण मुरारि, आप दिन-रात मेरे मन के मन्दिर में निवास करें।
  • पद 6अर्थ
    मेरा जीवन केवल आपके गुणगान में ही व्यतीत हो, हे कृष्ण मुरारि, श्री कृष्ण मुरारि!
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 7

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    माधव-तिथि, भक्ति-जननी,
    जेतने पालन कोरि
    कृष्ण-बसति, बसति बोलि',
    परम आदरे बोरि
  • पद 8भजन
    भकतिविनोद, कृष्ण-भजने,
    अनकूल पाय जाहा
    प्रति-दिबसे, परम-सुखे,
    स्वीकार कोरोये ताहा
  • पद 2अर्थ
    एकादशी, जन्माष्टमी जैसी माधव-तिथियाँ भक्ति की जननी हैं, इसलिए मैं बड़ी सावधानी से उनका पालन करता हूँ। और परम आदर व प्रेम से मैं कृष्ण के धाम को ही अपना निवास चुनता हूँ।
  • पद 8अर्थ
    कृष्ण-भजन के अनुकूल जो कुछ भी भक्तिविनोद को प्राप्त होता है, उसे वे प्रतिदिन परम सुख के साथ स्वीकार करते हैं।
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 5

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    कबे गौर-बने, सुरधुनी-तटे,
    "हा राधे हा कृष्ण" बो'ले
    कान्दिया बेड़ाबो, देहो-सुख छाड़ि,
    नाना-लता तरु-तले
  • पद 2भजन
    (कबे) श्वपच-गृहेते, मागिया खाइबो,
    पिबो सरस्वती-जल
    पुलिने पुलिने, गड़ागड़ि दिबो,
    कोरि' कृष्ण-कोलाहल
  • पद 1अर्थ
    कब मैं नवद्वीप में स्वर्ग-गंगा के तट पर, लता-वृक्षों की छाया में रोते हुए यहाँ-वहाँ भटकूँगा? मैं 'हा राधे! हा कृष्ण!' पुकारते हुए इस शरीर के तथाकथित सुखों को पूरी तरह भूल जाऊँगा।
  • पद 2अर्थ
    कब मैं चाण्डालों के घरों से भीख माँगकर भोजन करूँगा? मैं सरस्वती नदी का जल पीऊँगा, और नदी के दोनों तटों पर 'कृष्ण! कृष्ण!' का कोलाहल करते हुए आनन्द में लोट-पोट होऊँगा।
2 पद भजन में 3 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    नम ओं विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भू-तले
    श्रीमते भक्तिसिद्धान्त-सरस्वतीति नामिने
  • पद 2भजन
    श्री-वार्षभानवी-देवी-दयिताय कृपाब्धये
    कृष्ण-सम्बन्ध-विज्ञान-दायिने प्रभवे नमः
  • पद 1अर्थ
    मैं उनकी दिव्य कृपा श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती को सादर प्रणाम करता हूँ, जो श्री कृष्ण के अत्यन्त प्रिय हैं और भगवान विष्णु के चरणों की शरण में स्थित हैं।
  • पद 2अर्थ
    मैं श्री वार्षभानवी-देवी-दयित दास [श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती का ही एक नाम] को प्रणाम करता हूँ, जो श्रीमती राधारानी के प्रियतम श्री कृष्ण के दास हैं, जो कृपा के सागर हैं, और जो कृष्ण के साथ सम्बन्ध के दिव्य विज्ञान को प्रदान करने वाले गुरु हैं।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3अर्थ
    हे प्रभु! मैं आपको प्रणाम करता हूँ, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा-शक्ति के साक्षात् स्वरूप हैं। श्रील रूप गोस्वामी के अनुगामी होकर आप उस भक्ति को प्रदान करते हैं, जो राधा-कृष्ण के उज्ज्वल माधुर्य-प्रेम से समृद्ध है।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 2भजन
    ज्ञान ता'र पट्ट-शाटी जोग-गन्ध-परिपाटि
    ए सबे शोभित सती कोरे कृष्ण-मन चुरि
  • पद 3भजन
    रूप बिना अलङ्कारे किबा शोभा ए सोंसारे
    पीरिति-बिहीन गुणे कृष्ण न तुषिते पारि
  • पद 2अर्थ
    ज्ञान उसका रेशमी वस्त्र है। योग उसका सुगन्धित इत्र है। यह सती अत्यन्त सुन्दर है और भगवान कृष्ण के हृदय को चुरा लेती है।
  • पद 3अर्थ
    इस संसार में बिना सुन्दरता के आभूषण किसी को कैसे शोभा दे सकते हैं? इसी तरह, जिसके पास गुण तो हैं परन्तु प्रेम नहीं, वह भगवान कृष्ण को कैसे प्रसन्न कर सकता है?
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  • पद 4भजन
    बानरीर अलङ्कार शोभा ना होय ता'र
    कृष्ण-प्रेम बिना तथा गुणे ना आदर कोरि
  • पद 4अर्थ
    आभूषण किसी बन्दरिया को सुन्दर नहीं बना सकते। इसी प्रकार, जहाँ कृष्ण-प्रेम नहीं है, वहाँ मैं गुणों का कोई आदर नहीं करता।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · कल्याण-कल्पतरु

  • पद 2भजन
    कृष्ण-लीला-समुद्र अपार
    बैकुण्ठ-बिहार समान इहार
    कभु नाहे जा'नो सार
  • पद 3भजन
    कृष्ण नराकार सर्ब-रसाधार
    शृङ्गारेर बिशेषतह्
    बैकुण्ठ-साधक सख्ये अपारक
    मधुरे ना होय रत
  • पद 2अर्थ
    कृष्ण की लीलाएँ एक अपार सागर हैं, वैकुंठ की लीलाएँ इनके समान कभी नहीं हो सकतीं, यही इसका सार समझो।
  • पद 3अर्थ
    मनुष्य जैसे रूप वाले कृष्ण सभी रसों के आधार हैं, विशेषकर शृंगार-रस के। वैकुंठ के साधक सख्य-रस में भी असमर्थ हैं, और माधुर्य-रस में उनकी लगन नहीं होती।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    ब्रजे कृष्ण-धन नबीन-मदन
    अप्राकृत रसमोय
    जीबेर सहित नित्य-लीलोचित
    कृष्ण-गुण-गान होय
  • पद 4अर्थ
    व्रज में कृष्ण ही परम धन हैं। वे नए मदन हैं, अप्राकृत और रस से भरे हुए। वे जीवों के साथ नित्य लीला करते हैं। इस प्रकार मैं कृष्ण के गुण गाता हूँ।
1 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 7भजन
    तोमार चपलेखण हरे राधा-धैर्य-धन
    तुमि कृष्ण चोर-शिरोमणि
    बङ्क दृष्टि-भङ्गि तब श्री-कृष्ण-हृदयासब
    तुमि राधे कलाबती धनी
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 2भजन
    भजन-प्रकार जत सकलेर सार मत
    शिखाइलो श्री-रूप गोसाञि
    से भजन ना जानिया कृष्ण भजिबारे गिया
    तुच्छ काजे जीबन काटाइ
  • पद 3भजन
    बुझिबारे से भजन बहु जत्न अकिञ्चन
    बिरचिलो भजन-दरपण
    ब्रजे राधा-कृष्ण-सेबा कोरिते उत्सुक जेबा
    सुखे तेँह कोरुण श्रबण
  • पद 2अर्थ
    श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति के सर्वोत्तम मार्ग की शिक्षा दी। जो इस भक्ति को समझे बिना ही कृष्ण-भजन करने का प्रयास करता है, वह अपना जीवन केवल तुच्छ और निरर्थक कार्यों में बिता देता है।
  • पद 3अर्थ
    इस भक्ति को समझाने के लिए ही इस दीन जन ने यह "भजन-दर्पण" लिखा है। जो व्रज में राधा-कृष्ण की सेवा के लिए उत्सुक हो, वह इस ग्रन्थ को सहर्ष सुने।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    पुत्र-स्नेह जननीर सहज हृदोये स्थिर
    दूषित हृदोये शिखा चाइ
    कृष्ण-प्रेम सेइ रूप नित्य-सिद्ध अपरूप
    बद्ध-जीबे अप्रकट भाइ
  • पद 5अर्थ
    माँ के हृदय में पुत्र के लिए प्रेम सहज ही स्थिर रहता है, परन्तु दूषित हृदय को वह प्रेम सीखना पड़ता है। इसी तरह नित्य-सिद्ध जीव में अद्भुत कृष्ण-प्रेम स्वभाव से ही रहता है, परन्तु हे भाइयों, बद्ध जीव में वह प्रेम प्रकट नहीं होता।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    रत्य्-आस्वाद हेतु जत बिभाब नामेते ख्यात
    आलम्बन उद्दीपन होय
    बिषोय-आश्रोय-गत आलम्बन दुइ मत
    कृष्ण कृष्ण-भक्त से उभोय
  • पद 2भजन
    नायकेर शिरोमणि स्वयं कृष्ण गुण-मणि
    नित्य गुण-धाम परात् पर
    ताँर भाबे अनुरक्त गुणाढ्य जतेक भक्त
    सिद्ध एक साधक अपर
  • पद 1अर्थ
    रस का आस्वादन कराने वाले कारण विभाव कहलाते हैं। इसके दो भेद हैं: आलम्बन (मूल कारण) और उद्दीपन (सहायक कारण)। आलम्बन भी दो प्रकार का है: आश्रय, यानी प्रेम करने वाला भक्त, और विषय, यानी प्रियतम कृष्ण।
  • पद 2अर्थ
    भगवान कृष्ण स्वयं नायकों के शिरोमणि हैं, गुणों के रत्न हैं। वे समस्त दिव्य गुणों के नित्य धाम हैं और सबसे बड़े से भी बड़े हैं। जो भक्त उनके भाव में अनुरक्त हैं और गुणों से सम्पन्न हैं, उनमें कुछ सिद्ध हैं और कुछ साधक हैं।
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  • पद 3भजन
    भाब उद्दीपन कोरे उद्दीपन नाम धोरे
    कृष्णेर सम्बन्ध बस्तु सब
    स्मितास्य सौरभ शृङ्ग बंशी कम्बु खेत्र भृङ्ग
    पदाङ्कनूपुर कल-रब
  • पद 3अर्थ
    जो वस्तुएँ प्रेम-भाव को जगाती हैं, वे उद्दीपन कहलाती हैं। ये सभी वस्तुएँ कृष्ण से सम्बन्धित होती हैं, जैसे उनकी मुस्कान, शरीर की सुगन्ध, शृंगी (भैंसे के सींग का बाजा), बाँसुरी, शंख, निवास-स्थान, भ्रमर, चरण-चिह्न और पैरों के नूपुरों की झंकार।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · बाउल संगीत

  • पद 2भजन
    शुद्ध-जीवे जड नाइ भाइ, ठिक बुझो ताइ,
    निजे सखी (से) वृन्दावने
    से जखन् कृष्ण-चन्द्रे भजे, सुखेते मजे,
    मधुर-रसे अनुक्षणे
  • पद 3भजन
    जद-देहे ता'र् साधन-भक्ति, ज्ञान-विरक्ति,
    देहेर् यात्रा धर्म-भावे
    से गृहे थाके, बने बा थाके, मजिये डाके,
    ('कृष्ण') बोले' एक-मने
  • पद 2अर्थ
    शुद्ध जीवात्मा जड़ नहीं है, हे भाई, इसे ठीक से समझो, वह तो वृन्दावन की एक सखी ही है। जब वह अपने प्रियतम कृष्णचंद्र की भक्ति करती है, तब वह सुख में डूब जाती है और निरंतर मधुर रस का आस्वादन करती रहती है।
  • पद 3अर्थ
    भौतिक शरीर में रहते हुए भी वह साधना-भक्ति करती है, ज्ञान के द्वारा वैराग्य विकसित करती है, और इस प्रकार धर्म के अनुसार जीवन बिताती है। ऐसी साधिका घर में रहे या वन में, वह एकाग्र मन से 'कृष्ण, कृष्ण' पुकारते हुए तल्लीन रहती है।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    एके-इ तो' बोलि सहज-भजन्, शुद्ध-मन,
    कृष्ण पा'बार् एक उपाय
    इहा छाडि' जे आरोप कोरे, सेइ तो' मरे,
    ता'र् तो' नाहि भजन् होय्
  • पद 4अर्थ
    सचमुच इसे ही सहज-भजन कहा जाता है। यह शुद्ध मन से किया जाता है, और कृष्ण को पाने का यही एकमात्र उपाय है। जो इस मार्ग से हटकर अपनी मनगढ़ंत कल्पना थोप देता है, वह वास्तव में नष्ट हो जाता है, उसका वह कर्म भजन नहीं कहलाता।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 1भजन
    श्री-कृष्णः परमानन्दो गोविन्दो नन्द-नन्दनः
    तमाल-श्यामल-रुचिः शिखण्ड-कृत-शेखरः
  • पद 5भजन
    गान्धर्वाप्ति-महा-पर्व राधाराधन-पेशलः
    इति श्री-कृष्ण-चन्द्रस्य नाम विंशति-संज्ञितम्
  • पद 1अर्थ
    श्री कृष्ण, परम आनंद-स्वरूप, गोविन्द, नन्द के पुत्र, तमाल वृक्ष के समान श्याम और कान्तिमान, मयूर-पंख का मुकुट धारण करने वाले;
  • पद 5अर्थ
    जिनके लिए राधा की प्राप्ति ही सबसे बड़ा उत्सव है, जो सदा उनकी आराधना में तत्पर रहते हैं। इस प्रकार श्री कृष्णचन्द्र के ये बीस नाम कहे गए हैं।
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  • पद 6भजन
    आनन्दाख्यं महा-स्तोत्रं यः पठेच् छृणुयाच् च यः
    स परं सौख्यम् आसाद्य कृष्ण-प्रेम-समन्वितः
  • पद 6अर्थ
    जो कोई आनंद नामक इस महान स्तोत्र का पाठ करता है या सुनता है, वह कृष्ण-प्रेम से युक्त होकर परम सुख को प्राप्त करता है,