“गौर आरती” के परिणाम
439 भजन · 566 पद भजन के शब्दों में · 472 पद अर्थ में
इनमें से कोई भी शब्द वाले भजन, सारे शब्दों वाले पहले। केवल सारे शब्दों वाले भजन
2 पद भजन में
3 पद अर्थ में
- पद 2अर्थउनकी मन्थर गति मत्त हाथियों की चाल को भी हरा देती है। प्रेमोन्माद से अभिभूत होकर वे डगमगाते-डगमगाते चलते हैं। उनके गेरुए वस्त्र उदित सूर्य को भी हरा देते हैं। उनके गौर अंग दिव्य लीलाओं की लहरों में क्रीड़ा करते हैं।
- पद 3अर्थभाव में डूबे भगवान् गौरचन्द्र चल नहीं पाते। अब वे बोल भी नहीं पाते, केवल आधे-आधे शब्द बोलते हैं। प्रेम में विभोर होकर वे पुकारते हैं, 'हरि! हरि!' वे सबको, नीच चाण्डाल तक को, अपनी भुजाओं में भर लेते हैं।
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- पद 4अर्थहाय! उस आनन्दमय सौभाग्य के समय मैंने भगवान् गौर की उपासना नहीं की। मैंने उनके चरणों को पाने की आकांक्षा नहीं की। इस प्रकार वृन्दावन दास श्रीकृष्ण चैतन्यचन्द्र और ठाकुर श्री नित्यानन्द की महिमा का गान करते हैं।
3 पद अर्थ में
- पद 1अर्थप्रेम की क्रीड़ा करते हुए गौर नाचते हैं। सम्पूर्ण लोकों के स्वामी नदिया में विहार करते हैं।
- पद 2अर्थनाचते-नाचते गौर को दिशा का ज्ञान नहीं रहता। उनके मुख का चन्द्रमा 'हरि' बोलता है, और वे रोते-रोते नाचते हैं।
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- पद 3अर्थगोलोक से लाये गये प्रेम-रस के धन को वे सब जीवों में उदारतापूर्वक बाँट देते हैं। 'हरिबोल' बोलते हुए गौर संकीर्तन में नाचते हैं।
3 पद अर्थ में
- पद 1अर्थसिंहद्वार को छोड़कर श्री गौर समुद्र की ओर दौड़ते हैं। "कृष्ण कहाँ हैं? कृष्ण कहाँ हैं?" वे पुकारते हैं।
- पद 2अर्थचारों ओर से घेरकर भक्तजन श्री हरि की महिमा गाते हैं। श्री गौर धूल में लोटते हुए स्वर्ण पर्वत के समान हो गए हैं।
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- पद 3अर्थश्री गौर भूमि पर गिर पड़ते हैं। उनका ऊँचा शरीर अब मूर्च्छित है।
3 पद अर्थ में
- पद 1अर्थश्री गौर राय फिर से होश में आते हैं। फिर धरती पर गिर पड़ते हैं। फिर उठते हैं।
- पद 5अर्थश्री गौरचन्द्र को इस प्रकार कहते देख भक्तजन रो पड़ते हैं।
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- पद 6अर्थवासुदेव घोष कहते हैं, मेरे प्रभु श्री गौर श्री कृष्ण के प्रति दिव्य प्रेम से अभिभूत हैं।
3 पद अर्थ में
- पद 2अर्थजब गौर प्रभु इस संसार में अवतरित हुए, तब नित्यानन्द प्रभु किसी संन्यासी के साथ जाने के बहाने घर से निकल पड़े। उन्होंने अनेक तीर्थों की यात्रा की। फिर बीस वर्ष बाद वे आनन्द से नदिया आए।
- पद 3अर्थगौरचंद्र प्रभु ही उनके प्राण थे। वे गौरचंद्र प्रभु द्वारा बिछाए गए प्रेम के इस जाल में फँस गए। उन्होंने अपना दंड और कमंडल दूर फेंक दिया। उनका चित्त सदा संकीर्तन में लगा रहता था। वे गौरचंद्र प्रभु के साथ जगन्नाथ-क्षेत्र की यात्रा पर गए। वहाँ नित्यानन्द प्रभु…
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- पद 4अर्थगौरचंद्र प्रभु के आदेश से वे जगन्नाथ-क्षेत्र से लौटकर गौड़-देश आए। उन्होंने गौरचंद्र प्रभु के हृदय की इच्छा पूर्ण करने का प्रयास किया। उन्होंने प्रेम के इस दान को मुक्त हस्त से बाँटा। वे जाह्नवा और वसुधा के पति और नरहरि दास के आश्रय हैं।
2 पद भजन में
1 पद भजन में
2
- पद 2भजनआमार गौराङ्गेर घाटे अदान-खेया वय
जद, अन्ध, आतुर अवधि पार हय
1 पद भजन में
2
- पद 1भजनउज्ज्वल-वरण-गौर-वर-देहं
विलसित-निरवधि-भाव-विदेहम्
त्रि-भुवन-पावन-कृपायाः लेशं
तं प्रणमामि च श्री-शची-तनयम्
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
- पद 1भजन…श्री-चैतन्य नित्याननद श्रीबासादि भक्त-बृन्द
गौरीदास पण्डितेर घरे
लुचि चिनि खीर सार मिठाइ पायस आर
पिठा-पाना आस्वादन कोरे - पद 1अर्थश्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानन्द, श्रीवास और अन्य अनेक भक्तों ने गौरीदास पंडित के घर पर पूरी, चीनी, दूध, मलाई, खीर, मीठे पकवान, मिठाइयाँ और अमृत जैसे पेय पदार्थों का आस्वादन किया।
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
- पद 7भजनश्रीमूख सून्दर बर हेम नील कान्तिधर
भाव भूषण करु शोभा
नील पीत-बासधर गौरी श्याम मनोहर
अन्तरेर भावे दूँहु लोभा - पद 7अर्थउनके सुन्दर मुख सोने और नीली कान्ति से चमकते हैं, और भाव ही उनकी शोभा के आभूषण हैं। नीले और पीले वस्त्र पहने गौरी राधा और श्याम कृष्ण मन को हर लेते हैं, और मन के भीतर के भाव से एक-दूसरे पर लुभाए रहते हैं।
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
- पद 19भजनहेम-गौरि-तनू राइ आङ्खि दरशन चाइ
रोदन करिब अभिलाषे
जलधर धर धर अङ्ग अति मनोहर
रूपे गुणे भूबन प्रकाशे - पद 19अर्थसोने जैसी गौर देह वाली राधा को अपनी आँखों से देखने की अभिलाषा में मैं रोऊँगा। कृष्ण का श्याम रंग नए बादल जैसा है, उनके अंग अति मनोहर हैं, और उनके रूप और गुण सारे जगत को प्रकाशित करते हैं। उन्हें देखने के लिए भी मैं रोऊँगा।
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में
1 पद भजन में
1 पद अर्थ में