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“जय राधा माधव” के परिणाम

536 भजन · 902 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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5 पद भजन में 1 पद अर्थ में

गौर किशोर दास बाबाजी

  • पद 1भजन
    कोथाय गो प्रेममयि राधे राधे
    राधे राधे गो, जय राधे राधे
  • पद 6भजन
    (गोसाइ) एक-बार डाके राधा-कुण्डे,
    आबार डाके श्याम-कुण्डे, राधे राधे
    (गोसाइ) एक-बार डाके कुसुम-वने,
    आबार डाके गोवर्धने, राधे राधे
  • पद 1अर्थ
    हे प्रेममयी राधा, तुम कहाँ हो? राधे राधे, राधे राधे, हे राधे राधे की जय!
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 8भजन
    (गोसाइ) मुखे राधा राधा बले,
    भासे नयनेर जले, राधे राधे
    (गोसाइ) वृन्दावने कुलि कुलि केदे बेड़ाय
    राधा बलि', राधे राधे
  • पद 9भजन
    (गोसाइ) छापान्न दण्ड रात्रि-दिने
    जाने ना राधा-गोविन्द विने, राधे राधे
  • पद 10भजन
    तार पर चारि दण्ड शुति' थाके
    स्वप्ने राधा-गोविन्द देखे, राधे राधे
4 पद भजन में 4

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 3भजन
    तोमार् कनक, भोगेर् जनक,
    कनकेर् द्वारे सेवहो 'माधव'
    कामिनीर् काम, नहे तव धाम,
    ताहार्-मालिक केवल 'यादव'
  • पद 7भजन
    कीर्तन छाडिबो, प्रतिष्ठा माखिबो,
    कि काज ढुडिया तादृश गौरव
    माधवेन्द्र पुरी, भाव-घरे चुरि,
    ना कोरिलो कभु सदाइ जानबो
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 12भजन
    यथा-योग्य भोग, नाहि तथा रोग,
    'अनासक्त' सेइ, कि आर् कहबो
    'आसक्ति-रोहित,' 'सम्बन्ध-सहित,'
    विषय-समूह सकलि 'माधव'
  • पद 17भजन
    राधा-दास्ये रोहि', छाडि 'भोग-अहि,'
    'प्रतिष्ठाशा' नहे 'कीर्तन-गौरव'
    'राधा-नित्य-जन,' ताहा छाडि' मन,
    केनो वा निर्जन-भजन-कैतव
5 पद भजन में 5 पद अर्थ में 3

वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    जय जय देव हरि
    जय जय देव हरि
  • पद 3भजन
    जय जय देव हरि
    जय जय देव हरि
    जय प्रभु दीन-दयाल हरि
  • पद 1अर्थ
    गोविन्द हरि की जय हो, गोपाल हरि की जय हो! जय हो, जय हो भगवान हरि की!
  • पद 3अर्थ
    जय हो, जय हो भगवान हरि की! जय हो उन प्रभु की जो पतितों पर अत्यन्त दयालु हैं!
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    जय जय देव हरि
    जय जय देव हरि
  • पद 5भजन
    जय राम हरि जय कृष्ण हरि
    जय जय-शची-नन्दन गौर-हरि
  • पद 6भजन
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    गोविन्द हरि गोपाल हरि
    जय जय देव हरि
    जय जय देव हरि
  • पद 4अर्थ
    जय हो, जय हो भगवान हरि की! जय हो गोविन्द हरि की, जो गौओं को आनन्द देने वाले हैं, जय हो गोपाल हरि की, जो गौओं की रक्षा करने वाले हैं!
  • पद 5अर्थ
    जय हो राम हरि की, जय हो कृष्ण हरि की! जय हो, जय हो माता शची के पुत्र, गौरवर्ण गौर हरि की!
  • पद 6अर्थ
    गोविन्द हरि की जय हो, गोपाल हरि की जय हो! जय हो, जय हो भगवान हरि की!
2 पद भजन में 2 पद अर्थ में 6

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 3भजन
    ब्रज-जन-पालन, असुर-कुल-नाशन
    नन्द-गोधन-राखोवाला
    गोविन्द माधव, नवनीत-तस्कर,
    सुन्दर नन्द-गोपाला
  • पद 4भजन
    यामुन-तट-चर, गोपी-बसन-हर,
    रास-रसिक, कृपामोय
    श्री-राधा-वल्लभ, बृन्दाबन-नटबर,
    भकतिविनोद्-आश्रय
  • पद 3अर्थ
    कृष्ण व्रजवासियों के रक्षक हैं, असुरों के वंशों का नाश करने वाले हैं, नन्द महाराज की गौओं के रखवाले हैं, गौओं, भूमि और इन्द्रियों को आनन्द देने वाले गोविन्द हैं, लक्ष्मी के पति माधव हैं, माखन-चोर हैं, और नन्द महाराज के सुन्दर गोपाल हैं।
  • पद 4अर्थ
    …वस्त्र चुरा लिए थे। वे रासलीला के रस में आनंदित रहते हैं, वे अत्यंत करुणामय हैं, श्रीमती राधारानी के प्रियतम और प्रिय हैं, वृन्दावन के महान नर्तक हैं, और भक्तिविनोद के एकमात्र आश्रय और शरण हैं।…
5 पद भजन में 6 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    राधिका-चरण-पद्म सकल-श्रेयेर सद्म
    जतने जे नाहि आरधिलो
    राधा-पद्माङ्कित-धाम बृन्दाबन जार नाम
    तह जे ना आश्रोय कोरिलो
  • पद 3भजन
    राधिका उज्ज्वल-रसेर् आचार्ज
    राधा-माधब-शुद्ध-प्रेम बिचार्ज
  • पद 1अर्थ
    जो व्यक्ति इस जीवन में श्री राधा के चरण-कमलों की, जो समस्त मंगल के धाम हैं, यत्नपूर्वक आराधना नहीं करता, और श्री राधा के उस पद्म-चिह्नित वृन्दावन धाम की शरण नहीं लेता,
  • पद 2अर्थ
    और जो जीवन में राधा-प्रेम में गहरे डूबे महान धीर भक्तों की संगति नहीं करता, वह भला श्रीकृष्ण-प्रेम रूपी रस के सागर में स्नान का आनन्द कैसे पा सकेगा? इसे एकचित्त होकर समझ लो।
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  • पद 4भजन
    जे धोरिलो राधा-पद परम जतने
    से पाइलो कृष्ण-पद अमूल्य-रतने
  • पद 5भजन
    राधा-पद बिना कभु कृष्ण नाहि मिले
    राधार दासीर कृष्ण सर्ब-बेदे बोले
  • पद 6भजन
    छोरतो धन-जन कलत्र-सुत-मित
    छोरतो करम गेयान
    राधा-पद-पङ्कज मधुरत सेबन
    भकतिबिनोद परमाण
  • पद 3अर्थ
    श्री राधा उज्ज्वल-रस की आचार्या हैं। अब हम श्री राधा-कृष्ण के शुद्ध प्रेम के विषय पर विचार करेंगे।
  • पद 4अर्थ
    जो कोई परम यत्न से श्री राधा के चरण पकड़ता है, वही श्रीकृष्ण के चरण रूपी अमूल्य रत्न को प्राप्त करता है।
  • पद 5अर्थ
    श्री राधा के चरणों की शरण के बिना कृष्ण कभी नहीं मिलते। सभी वेद कहते हैं कि कृष्ण तो राधा की दासियों के ही हैं।
  • पद 6अर्थ
    धन, जन, पत्नी, पुत्र और मित्रों को त्यागकर, तथा कर्म और ज्ञान से मुख मोड़कर, भक्तिविनोद श्री राधा के चरण-कमलों की मधुर सेवा में अपना जीवन समर्पित करने का संकल्प करते हैं।
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    महाभाब-चिन्तामणि उद्भाबित-तनु-खानि
    सखी-पति-सज्जा प्रभाबती
    कारुण्य-तारुण्य आर लाबण्य-अमृत-धारा
    ताहे स्नाता लक्ष्मी-जयी सती
  • पद 5भजन
    प्राणय-रोष-कञ्चुली- पिहित स्तन-जुग्मका
    चन्द्रा-जयी कच्छपी-रबिनी
    सखी-द्वय-स्खन्दे लीला- कराम्बुजार्पण-शीला
    श्यामा श्यामामृत-बितरणी
  • पद 1अर्थ
    श्री राधा महाभाव की चिन्तामणि हैं; उनका स्वरूप स्वयं बहुमूल्य रत्नों की खान है। अपनी सखियों द्वारा सजाई-धजाई वे परम तेजोमयी दिखती हैं। करुणा, यौवन और कान्ति की अमृत-धाराओं में स्नान करती हुई वे साध्वी राधा लक्ष्मी देवी को भी पीछे छोड़ देती हैं।
  • पद 5अर्थ
    …है। वे लीला से अपने कमल-सम हाथों को अपनी दो सखियों के कंधों पर टिकाए रहती हैं। वे सुन्दरी राधा श्यामसुन्दर के प्रेम-अमृत को बाँटने वाली हैं।…
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6भजन
    ए हेनो राधिका-पद तोमादेर सु-सम्पद
    दन्ते तृण जाचे तब पाय
    ए भक्तिबिनोद दीन राधा-दास्यामृत-कण
    रूप-रघुनाथ देहो ताय
  • पद 6अर्थ
    श्री राधा के ऐसे चरण ही आपका सच्चा धन हैं। दाँतों में तिनका लेकर दीन भक्तिविनोद आपके चरणों में यह विनती करते हैं: 'हे रूप गोस्वामी, हे रघुनाथ दास गोस्वामी! मुझे श्री राधा की सेवा के अमृत की एक बूँद दे दीजिए।'
3 पद भजन में 3 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · शरणागति

  • पद 5भजन
    माधवी मालती उठाबुँ ताहे
    छाया-मन्डप कोरोबुँ तँहि माहे
  • पद 8भजन
    वैष्णव-जन-सह गाओबुँ नाम्
    जय गोद्रुम जय गौर कि धाम्
  • पद 5अर्थ
    उन वृक्षों पर चढ़ने के लिए मैं माधवी और मालती की बेलें लगाऊँगा, और कुंज के बीचोंबीच एक छायादार मंडप बनाऊँगा।
  • पद 8अर्थ
    वैष्णवों की संगति में मैं नाम-कीर्तन करूँगा। गोद्रुमद्वीप की जय हो! श्री गौरांग के धाम की जय हो!
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  • पद 9भजन
    भकतिविनोद भक्ति-अनुकूल्
    जय कुञ्ज, मुञ्ज, सुर-नदी-कूल्
  • पद 9अर्थ
    भक्तिविनोद भक्ति के अनुकूल सब कुछ की जयकार करता है। कुंजों की जय हो, तृणों की जय हो, गंगा के तट की जय हो!
5 पद भजन में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतमाला

  • पद 1भजन
    आमि अति दिन-मति ब्रज-कुञ्जे निबसति
    राधा-कृष्ण-जुगल-चरणे
    कान्दिया कान्दिया अज छाडि' सब लोक लज
    निबेदिबो जत आछे मने
  • पद 6भजन
    तरङ्ग-सौरभ-कण बंशी-गीत अनुखण
    ओहे कृष्ण राधा-मन होरे
    राधे अङ्ग-गन्ध तब तोमार सु-बिना-रब
    कृष्ण-चित्त उन्मादित कोरे
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 7भजन
    तोमार चपलेखण हरे राधा-धैर्य-धन
    तुमि कृष्ण चोर-शिरोमणि
    बङ्क दृष्टि-भङ्गि तब श्री-कृष्ण-हृदयासब
    तुमि राधे कलाबती धनी
  • पद 24भजन
    भाब चित्त-सुखकर जत आछे सु-मधुर
    प्रकटाप्रकट लीला-स्थाने
    राधा-कृष्ण-प्रेम-सार सकलेर सारात् सार
    सेइ भाब जेनि कृपा-बले
  • पद 36भजन
    दुँहे हार धोरि' पणे द्यूत-क्रीडा समापने
    आमि जयी आमि जयी बोलि'
    कोरिबे कलह तबे हर-सङ्ग्रहेते कबे
    आमि ताहा देखिबो सकलि
5 पद भजन में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 4भजन
    श्री-श्री-वृन्दावनानन्द
    यशोदानन्द-वर्धन
    राधा-गोविन्द राधेश
    राधिका-प्राण-वल्लभ
  • पद 5भजन
    श्री-राधा-हृदयानन्द
    गोष्ठानन्द प्रियं-वद
    नन्दात्मज चिद्-आनन्द
    श्री-नन्द-कुल-भूषण
इस भजन में 3 और मिलान दिखाएँ
  • पद 8भजन
    श्री=गोपि-मोहन कृष्ण
    श्री-राधा-रमण प्रभो
    ईश्वरस् त्वं परमः कृष्ण
    मनो-'भिष्ट-प्रदायक …
  • पद 13भजन
    देवेन्द्र परमानन्द
    गोविन्द नन्द-बालक
    राधा-विनोदिनी-स्वामिन्
    श्री-गोपी-जन-वल्लभ
  • पद 16भजन
    श्रीमन्-नारायण ब्रह्मन्
    श्री-पते पुरुषोत्तम
    यादव माधव देव
    केशव राम राघव
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में 5

विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 5भजन
    श्री-राधिका-माधवयोर् अपार
    माधुर्य-लीला गुण-रूप-नाम्नाम्
    प्रति-क्षणास्वादन-लोलुपस्य
    वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम्
  • पद 3अर्थ
    गुरुदेव सदैव श्री श्री राधा-कृष्ण की मन्दिर-सेवा में लगे रहते हैं और अपने शिष्यों को भी इस सेवा में लगाते हैं। वे विग्रहों को सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से सजाते हैं, उनके मन्दिर की सफाई करते हैं और भगवान की अन्य प्रकार की सेवा करते हैं। ऐसे गुरुदेव के…
  • पद 5अर्थ
    गुरुदेव सदैव राधिका और माधव की असीम प्रेम-लीलाओं तथा उनके गुणों, नामों और रूपों को सुनने और कीर्तन करने के लिए उत्सुक रहते हैं। गुरुदेव प्रतिक्षण इनका आस्वादन करने की लालसा रखते हैं। ऐसे गुरुदेव के श्रीचरणकमलों में मैं सादर प्रणाम करता हूँ।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6अर्थ
    …प्रिय हैं, क्योंकि वे उन गोपियों की सहायता करने में निपुण हैं, जो वृन्दावन की कुंजों में राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं की सिद्धि के लिए समय-समय पर तरह-तरह की सुन्दर व्यवस्थाएँ करती हैं। ऐसे गुरुदेव के श्रीचरणकमलों में मैं अत्यन्त विनम्रता से प्रणाम करता हूँ।…
8 पद भजन में 2

वेदान्त देशिक

  • पद 1भजन
    प्रतिभटश्रेणी भीषण वरगुणस्तोम भूषण
    जनिभयस्थान तारण जगदवस्थान कारण
    निखिलदुष्कर्म कर्शन निगमसद्धर्म दर्शन
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 2भजन
    शुभजगद्रूप मण्डन सुरगणत्रास खण्डन
    शतमखब्रह्मवन्दित शतपथब्रह्मनन्दित
    प्रथितविद्वत् सपक्षित भजदहीर्बुध्न्यलक्षित
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    स्फुटतटिज्जाल पिञ्जर पृथुतरज्वाल पञ्जर
    परिगतप्रत्नविग्रह पटुतरप्रज्ञदुर्ग्रह
    प्रहरणग्राम मण्डित परिजनत्राणपण्डित
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 4भजन
    निजपदप्रीतसद्गुण निरुपधिइस्फीत षड्गुण
    निगमनिर्व्यूढवैभव निजपरव्यूहवैभव
    हरिहयद्वेषिदारण हरपुरप्लोषकारण
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 5भजन
    दनुजविस्तारकर्तन जनितमिस्राविकर्तन
    दनुजविद्यानिकर्तन भजदविद्यानिवर्तन
    अमरदृष्टस्वविक्रम समर जुष्टभ्रमिक्रम
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 6भजन
    प्रथिमुखालीढबन्धुर पृथुमहाहेतिदन्तुर
    विकटमाया बहिष्कृत विविधमाला परिष्कृत
    स्थिरमहायन्त्र तन्त्रित दृढदयातन्त्रयन्त्रित
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 7भजन
    महितसम्पत् सदक्षर विहितसम्पत् षडक्षर
    षडरचक्र प्रतिष्ठित सकलतत्त्व प्रतिष्ठित
    विविधसकल्प कल्पक विबुधसङ्कल्प कल्पक
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
  • पद 8भजन
    भुवननेत्र त्रयीमय सवनतेजस्त्रयीमय
    निरवधिस्वादु चिन्मय निखिलशक्ते जगन्मय
    अमितविश्वक्रियामय शमितविश्वग्भयामय
    जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन
4 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 10भजन
    श्री-राधा-बल्लभ राधा-माधब सुन्दर
    ललिता-बिशाखा-आदि-सखी-प्राणेश्वर
  • पद 12भजन
    त्रि-भङ्गी मुरली-धर जामुन-नागर
    राधा-कुण्ड-रङ्ग-नेता रसेर सागर
  • पद 10अर्थ
    हे श्री राधा के प्रियतम (श्री राधा-वल्लभ), हे राधा के पति (राधा-माधव), हे सुंदर प्रभु (सुन्दर), हे ललिता, विशाखा आदि सखियों के प्राणों से भी प्रिय स्वामी (ललिता-विशाखा-आदि-सखी-प्राणेश्वर)!
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 13भजन
    चन्द्राबली-प्राण-नाथ कौतुकाभिलाषी
    राधा-मान-सुलम्पट मिलन-प्रयासी
  • पद 17भजन
    गोपी-गीत-श्रोता मधुसूदन मुरारि
    अरिष्ट-घातक राधा-कुण्डादि-बिहारी
2 पद भजन में 4 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 3भजन
    भङ्गिया श्री-रास- मण्डल तबे
    राधा-अन्बेषणे चलये जबे
  • पद 5भजन
    निर्जन कानने राधारे धरि'
    मिलिया परण जुराय हरि
  • पद 1अर्थ
    सैकड़ों करोड़ों गोपियाँ यत्नपूर्वक प्रयास करके भी माधव के हृदय को शान्त नहीं रख पाईं।
  • पद 3अर्थ
    तब श्री रास-मण्डल को तोड़कर श्रीकृष्ण राधा की खोज में चल पड़ते हैं।
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5अर्थ
    एकान्त वन में राधा को पाकर श्रीकृष्ण उनका आलिंगन करते हैं। उस मिलन से श्रीकृष्ण के व्याकुल प्राण शीतल हो जाते हैं।
  • पद 7अर्थ
    श्री राधा के चरणों में इस प्रकार खड़े होकर भक्तिविनोद रोते हुए कहते हैं:
5 पद भजन में 5 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    (हरे) हरये नमः कृष्ण जादबाय नमः
    जादबाय माधबाय केशबाय नमः
    गोपाल गोबिन्द राम श्री-मधुसूदन
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 2भजन
    गोबिन्द गोबिन्द गोबिन्द बोलो
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
    गुरु-कृपा जले नाशि' बिषय-अनल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 1अर्थ
    (हरि!) भगवान हरि को प्रणाम! यदुवंशी भगवान कृष्ण को प्रणाम! भगवान कृष्ण को प्रणाम, जो लक्ष्मी के पति हैं, ब्रह्मा और शिव के स्वामी हैं, और यदुवंश में अवतरित हुए हैं! हे गोपाल! हे गोविन्द! हे राम! हे श्री मधुसूदन! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
  • पद 2अर्थ
    बोलो, "गोविन्द! गोविन्द! गोविन्द!" बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार) गुरु की कृपा के जल से विषय की जलती हुई आग को बुझा दो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    कृष्णेते अर्पिया देह-गेहादि सकल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
    अनन्य-भाबेते चित्त कोरिया सरल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 4भजन
    रूपानुग बैष्णबेर पिया पद-जल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
    दश अपराध त्यजि' भुक्ति-मुक्ति-फल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 5भजन
    सखीर चरण-रेणु कोरिया सम्बोल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
    स्वरूपेते ब्रज-बासे होइया शीतल
    राधा-गोबिन्द बोलो (4 तिमेस्)
  • पद 3अर्थ
    अपना शरीर, घर और सब कुछ भगवान कृष्ण को समर्पित करो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार) अपने हृदय को सरल बनाकर अनन्य भाव से उनसे प्रेम करो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
  • पद 4अर्थ
    श्रील रूप गोस्वामी के अनुयायी शुद्ध वैष्णव के चरणों को धोया हुआ जल पियो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार) दस प्रकार के अपराधों को छोड़ो! भौतिक इन्द्रिय-सुख और निर्विशेष मुक्ति के फल को छोड़ो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
  • पद 5अर्थ
    गोपियों के चरणों की धूल को अपना धन और खज़ाना बनाओ। बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार) विषय की जलती हुई आग को बुझा दो। शीतल और तृप्त होकर अपने स्वरूप में प्रकट होओ, और सदा व्रज में निवास करो! बोलो, "राधा-गोविन्द!" (4 बार)
3 पद भजन में 2 पद अर्थ में

रूप गोस्वामी

  • पद 3भजन
    धरे धराधर-धरं
    धराधर-धुरा-रूढम्
    धीर-धीर् आरराधाधि-
    रोधं राधा धुरन्धरम्
  • पद 6भजन
    रासे सारङ्ग-सङ्घाचित-नव-नलिन-प्राय-वक्षः-स्थ-दामा
    बर्हालङ्कार-हार-स्फुरद्-अमल-महा-राग-चित्रे जयाय
    गोपालो दास-वीथी-ललित-हित-रव-स्फार-हासः स्थिरात्मा
    नव्यो 'जस्रं क्षणोपाश्रित-वितत-बलो वीक्ष्य रङ्गं बभासे
  • पद 3अर्थ
    स्थिर बुद्धि वाली राधा उनकी पूजा करती हैं और उन्हें आलिंगन में लेती हैं, जो पर्वत को धारण करते हैं, पर्वतों का भार उठाने में दृढ़ हैं, शोक को रोकते हैं और हर भार उठाने वालों में सबसे आगे हैं।
  • पद 8अर्थ
    श्रीकृष्ण का वह रूप चौड़े और दृढ़ गोवर्धन पर्वत को धारण करने से अत्यन्त दीप्तिमान है, उन शत्रुओं का संहार करता है जिनका गर्व नहीं गया, मनोहर माला से शोभित है और राधा की प्रेममयी आराधना के रस से प्राप्त होता है।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 8भजन
    तायि-सार-धराधारा-
    तिभायात-मदारिहा
    हारि-दामतया भाति
    राधाराध-रसायिता
1 पद भजन में 2 पद अर्थ में 9

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    नृसिंह वामन, श्री-मधुसूदन,
    ब्रजेन्द्र-नन्दन श्याम
    पूतना-घातन, कैटभ-शातन,
    जय दाशरथि-राम
  • पद 2अर्थ
    वे नृसिंह और वामन के रूप में अवतरित हुए, वे मधुसूदन हैं। वे व्रजराज के श्यामवर्ण दुलारे पुत्र हैं। वे पूतना का वध करने वाले और कैटभ का नाश करने वाले हैं। दशरथि राम की जय हो!
  • पद 3अर्थ
    वे यशोदा के दुलारे हैं, गोविंद और गोपाल हैं, वृन्दावन के राजा हैं। वे गोपियों के प्रियतम और राधा-रमण हैं, और सारे लोकों में सबसे सुंदर हैं।
8 पद भजन में

रघुनाथ दास गोस्वामी

  • पद 1भजन
    वृषभ-दनुज-नाशान् नर्म-धर्मोक्ति-रङ्गैर्
    निखिल-निज-सखीभिर् यत् स्व-हस्तेन पूर्णम्
    प्रकटितम् अपि वृन्दारण्य-राज्ञा प्रमोदैस्
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 2भजन
    व्रज-भुवि मुर-शत्रोः प्रेयसीनां निकामैर्
    असुलभम् अपि तूर्णं प्रेम-कल्प-द्रुमं तम्
    जनयति हृदि भूमौ स्नातुर् उच्चैर् प्रियं यत्
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
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  • पद 3भजन
    अघ-रिपुर् अपि यत्नाद् अत्र देव्याः प्रसाद-
    प्रसर-कृत-कटाक्ष-प्राप्ति-कामः प्रकामम्
    अनुसरति यद् उच्चैः स्नान-सेवानुबन्धैस्
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 4भजन
    व्रज-भुवन-सुधांशोः प्रेम-भूमिर् निकामं
    व्रज-मधुर-किशोरी-मौलि-रत्न-प्रियेव
    परिचितम् अपि नाम्ना या च तेनैव तस्यास्
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 5भजन
    अपि जन इह कश्चिद् यस्य सेवा-प्रसादैः
    प्रणय-सुर-लता स्यात् तस्य गोष्ठेन्द्र-सूनोः
    सपदि किल मद्-ईशा-दास्य-पुष्प-प्रशस्या
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 6भजन
    तट-मधुर-निकुञ्जाः क्लृप्त-नामान उच्चैर्
    निज-परिजन-वर्गैः संविभज्याश्रितास् तैः
    मधुकर-रुत-रम्या यस्य राजन्ति काम्यास्
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 7भजन
    तट-भुवि वर-वेद्यां यस्य नर्माति-हृद्यां
    मधुर-मधुर-वार्तां गोष्ठ-चन्द्रस्य भङ्ग्या
    प्रथयति मिथ ईशा प्राण-सख्यालिभिः सा
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
  • पद 8भजन
    अनुदिनम् अति-रङ्गैः प्रेम-मत्तालि-सङ्घैर्
    वर-सरसिज-गन्धैर् हारि-वारि-प्रपूर्णे
    विहरत इह यस्मिन् दम्-पती तौ प्रमत्तौ
    तद् अति-सुरभि राधा-कुण्डम् एवाश्रयो मे
2 पद भजन में 6

विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर

  • पद 7भजन
    यत्रैव गङ्गाम् अनु नावि राधाम्
    आरोह्य मध्ये तु निमग्न-नौकः
    कृष्णो हि राधानुगलो बभौ स
    गोवर्धनो मे दिशताम् अभीष्टम्
  • पद 9भजन
    एतत् पठेद् यो हरि-दास-वर्य
    महानुभावाष्टकम् आर्द्र-चेताः
    श्री-राधिका-माधवयोः पदाब्ज
    दास्यं स विन्देद् अचिरेण साक्षात्
3 पद भजन में 1 पद अर्थ में

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 6भजन
    शत-कोती-गोपी माझेते होरि
    राधा-सह नाचे आनन्द कोरि'
  • पद 9भजन
    मथिता बरज- किशोर-मन
    अन्तरित होय राधा तखन
  • पद 7अर्थ
    मधुर गीत गाकर, माधव-मोहिनी श्री राधा ने सारे जगत के हृदय को मोहित कर लिया।
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  • पद 10भजन
    भकतिबिनोद परमाद गणे
    रास भाङ्गल (अजि) राधा-बिहने
3 पद भजन में 7 पद अर्थ में

नरोत्तम दास ठाकुर · प्रेम-भक्ति-चन्द्रिका

  • पद 1भजन
    जूगल-चरण प्रीती परम आनन्द तति
    रति-प्रेमा मय पर-बन्धे
    कृष्ण-नाम-राधा-नाम उपासन रस-धाम
    चरणे पडिये परानन्दे
  • पद 15भजन
    अन्येर परश जेन नाहि कदाचित् हेन
    इहाते हैबे सबाधान
    राधा-कृष्ण नाम गान एइ से परम ध्यान
    आर ना करिह परमाण
  • पद 1अर्थ
    परम आनन्द में मैं युगल किशोर राधा-कृष्ण के चरणों में गहरा प्रेम रखूँगा, और उनकी प्रेम-भरी कथाएँ सुनूँगा। कृष्ण-नाम और राधा-नाम की उपासना ही सब रसों का धाम है। आनन्द में भरकर मैं उनके चरणों में गिर पड़ूँगा।
  • पद 2अर्थ
    मन से स्मरण करना ही प्राण है, यही अत्यन्त मधुर धाम है। राधा-कृष्ण की लीलाओं का स्मरण सब साधनों का सार है। यही साध्य है और यही साधन, इसके सिवा और कुछ नहीं। यही सब सिद्धियों का सार-तत्त्व है।
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  • पद 18भजन
    राधा-कृष्ण श्री-चरण ताते सब समर्पण
    श्री-चरणे बलिहारि जाँअ
    दूँहु नाम शुनि शुनि भक्त मूखे पूनि पूनि
    परम आनन्द सूख-पाञा
  • पद 15अर्थ
    अन्य अभक्तों के संग या स्पर्श से भी सदा सावधान रहो, ऐसा कभी न होने दो। राधा-कृष्ण के नाम का कीर्तन ही परम ध्यान है, इसके अतिरिक्त और किसी को साध्य मत मानो।
  • पद 17अर्थ
    मैं सदा शुद्ध भाव से राधा-कृष्ण की प्रेम-कथा के लिए प्रार्थना करूँगा, और नाम और मंत्र को उनसे अभिन्न मानूँगा। श्रद्धा से भरे मन से मैं उनके लाल श्री-चरणों का भजन करूँगा, जिससे हृदय की पाप-ग्रन्थियाँ कट जाएँगी।
  • पद 18अर्थ
    मैं राधा-कृष्ण के श्री-चरणों में अपना सब कुछ समर्पित करता हूँ, और उन चरणों पर बलिहारी जाता हूँ। भक्तों के मुख से बार-बार दोनों के नाम सुनकर मुझे परम आनन्द और सुख मिलता है।
  • पद 19अर्थ
    सोने जैसी गौर देह वाली राधा को अपनी आँखों से देखने की अभिलाषा में मैं रोऊँगा। कृष्ण का श्याम रंग नए बादल जैसा है, उनके अंग अति मनोहर हैं, और उनके रूप और गुण सारे जगत को प्रकाशित करते हैं। उन्हें देखने के लिए भी मैं रोऊँगा।
  • पद 20अर्थ
    सखियाँ चारों ओर रहकर बड़े चाव से राधा-कृष्ण की सेवा करती हैं, और उस सेवा का परम सुख पाती हैं। मेरे मन में यही इच्छा है कि इसी रस में मग्न होकर नरोत्तम सदा विहार करे।