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“जय राधा माधव” के परिणाम

538 भजन · 903 पद भजन के शब्दों में · 608 पद अर्थ में

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1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 10

भक्तिविनोद ठाकुर · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    (जय) राधा-माधव (जय) कुञ्ज-बिहारी
    (जय) गोपी-जन-वल्लभ (जय) गिरि-वर-धारी
    (जय) जशोदा-नन्दन, (जय) ब्रज-जन-रञ्जन,
    (जय) जामुन-तीर-वन-चारी
  • पद 1अर्थ
    जय राधा-माधव! जय कुञ्ज-बिहारी! कृष्ण राधा के प्रियतम हैं, वे वृन्दावन के कुञ्जों में विविध प्रेम-लीलाएँ करते हैं, वे व्रज की गोपियों के प्रियतम हैं, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले हैं, माता यशोदा के प्रिय पुत्र हैं, व्रजवासियों को आनन्द देने वाले हैं, और…
1 पद भजन में 3 पद अर्थ में 3

भक्तिविनोद ठाकुर · गीतावली

  • पद 1भजन
    जय जय राधा कृष्ण जुगल-मिलन
    आरति करोवे ललितादि सखी-गण
  • पद 1अर्थ
    जय जय राधा-कृष्ण के युगल-मिलन की जय! ललिता आदि सखियाँ उनकी आरती कर रही हैं।
  • पद 3अर्थ
    चपल माधव के बाईं ओर वृषभानु-नन्दिनी (राधा) हैं, नीले वस्त्रों में सजी, गौर वर्ण वाली, रूप और गुण में धन्य।
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6अर्थ
    श्री राधा-माधव के चरण-कमलों की आशा में भक्तिविनोद सखियों के चरणों में सुख से तैरते रहते हैं।
4 पद भजन में 3

जयदेव गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    हे गोविन्द हे गोपाल
    केशव माधव दीन-दोयाल्
  • पद 2भजन
    तुमि परम दोयाल् प्रभु, परम दोयाल्
    केशव माधव दीन दोयाल्
इस भजन में 2 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    पीत-बसन परि मयूरेर शिख धोरि
    मूरलीर् वाणी-तुले बोले राधा-नाम्
  • पद 4भजन
    तुमि मदेर गोपाल् प्रभु, मदेर गोपाल्
    केशव माधव दीन-दोयाल्
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में 5

रूप गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    राधे जय जय माधव-दयिते
    गोकुल-तरुणी-मण्डल-महिते
  • पद 1अर्थ
    हे राधे! हे माधव की प्रिया! हे गोकुल की समस्त तरुणी गोपियों द्वारा पूजित! आपकी जय हो, जय हो! आपकी जय हो, जय हो!
3 पद भजन में

राधामोहन · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य दया-सिन्धु
    पतित उद्धार हेतु जय दीन-बन्धु
  • पद 2भजन
    जय प्रेम-भक्ति-दाता दया कर मोरे
    दन्ते तृण करि डाके ए दास पामरे
इस भजन में 1 और मिलान दिखाएँ
  • पद 6भजन
    बिशेष प्रतिज्णा शुनि ए-इ कलि-युगे
    ए-इ भरसाय राधामोहन पापी मागे
2 पद भजन में

राधामोहन · गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य नाम-सार
    अपरूप कलप बिरिख अबतार
  • पद 4भजन
    हेन प्रभु न सेबिले कोन काज नय
    ए राधामोहन मागे चरणे आश्रय
1 पद भजन में 1 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    हरि हे दयाल मोर जय राधा-नाथ
    बार बार ए-इ बार लह निज साथ
  • पद 1अर्थ
    हे राधा के स्वामी! आपकी जय हो! हे हरि! मुझ पर कृपा करें! बार-बार, फिर-फिर मैं प्रार्थना करता हूँ, कृपया मुझे अपना पार्षद बना लें!
10 पद भजन में 10 पद अर्थ में

कृष्ण द्वैपायन व्यास

  • पद 1भजन
    गृहे राधा वने राधा राधा पृष्ठे पुरः स्थिता
    यत्र यत्र स्थिता राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 2भजन
    जिह्वा राधा श्रुतौ राधा राधा नेत्रे हृदि स्थिता
    सर्वाङ्ग-व्यापिनी राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 1अर्थ
    घर में राधा हैं, वन में राधा हैं; राधा ही आगे और पीछे खड़ी हैं। जहाँ-जहाँ राधा विद्यमान हैं, वहाँ मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 2अर्थ
    जिह्वा पर राधा हैं, कानों में राधा हैं, नेत्रों में राधा हैं और हृदय में बसी हैं; राधा ही समस्त अंगों में व्याप्त हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
इस भजन में 16 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    पूजा राधा जपो राधा राधिका चाभिवन्दने
    स्मृतौ राधा शिरो राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 4भजन
    गाने राधा गुणे राधा राधिका भोजने गतौ
    रत्रौ राधा दिवा राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 5भजन
    माधुर्ये मधुरा राधा महत्त्वे राधिका गुरुः
    सौन्दर्ये सुन्दरी राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 6भजन
    राधा रस-सुधा-सिन्धु राधा सौभाग्य-मञ्जरी
    राधा व्रजाङ्गना-मुख्या राधैवाराध्यते मया
  • पद 7भजन
    राधा पद्मानना पद्मा पद्मोद्भव-सुपूजिता
    पद्मे विवेचिता राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 8भजन
    राधा कृष्णात्मिका नित्यं कृष्णो राधात्मको ध्रुवम्
    वृन्दावनेश्वरी राधा राधैवाराध्यते मया
  • पद 10भजन
    कृष्णेन पठितं स्तोत्रं राधिका-प्रीतये परम्
    यः पठेत् प्रयतो नित्यं राधा-कृष्णान्तिगो भवेत्
  • पद 11भजन
    आराधित-मनाः कृष्णो राधाराधित-मानसः
    कृष्णाकृष्त-मना राधा राधा-कृष्णेति यः पठेत्
  • पद 3अर्थ
    पूजा राधा हैं, जप राधा हैं, और प्रणाम के हर कार्य में राधिका हैं; स्मरण में राधा हैं, शीश झुकाने में राधा हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 4अर्थ
    गान में राधा हैं, हर सद्गुण में राधा हैं, भोजन और गमन में राधिका हैं; रात्रि में राधा हैं, दिन में राधा हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 5अर्थ
    माधुर्य में राधा ही मधुरा हैं, महत्ता में राधिका ही महान् हैं, सौन्दर्य में राधा ही सुन्दरी हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 6अर्थ
    राधा रस-सुधा के सागर हैं, राधा सौभाग्य की मंजरी हैं, राधा व्रज की स्त्रियों में सर्वप्रमुख हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 7अर्थ
    कमल-मुखी राधा स्वयं पद्मा हैं; कमल से उत्पन्न ब्रह्मा द्वारा वे सम्यक् पूजित हैं; कमल में ही राधा का दर्शन होता है, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 8अर्थ
    राधा नित्य कृष्ण के स्वरूप हैं, और कृष्ण निश्चय ही राधा के स्वरूप हैं; राधा वृन्दावन की स्वामिनी हैं, मैं राधा की ही आराधना करता हूँ।
  • पद 10अर्थ
    यह स्तोत्र स्वयं कृष्ण द्वारा राधिका को प्रसन्न करने के लिए ही कहा गया है; जो कोई इसे संयमपूर्वक नित्य पाठ करता है, वह राधा-कृष्ण की समीपता प्राप्त करता है।
  • पद 11अर्थ
    राधा की आराधना से कृष्ण का मन जीता जाता है, और उन्हीं से उनका मन तृप्त होता है; इसी प्रकार राधा का मन भी कृष्ण द्वारा आकर्षित होता है, 'राधा-कृष्ण' का जाप करने वाले को यही फल प्राप्त होता है।
11 पद भजन में 1 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    जय जय गुरु गोसाञी-श्री-चरण सार
    याहा हैते हब पार ए भब-संसार
  • पद 3भजन
    जय रूप सनातन भट्ट रघुनाथ
    श्री-जीब गोपाल भट्ट दास रघुनाथ
  • पद 5अर्थ
    जय हो श्री राधा की, रसमयी लीला की नायिका! जय हो श्री कृष्ण की, नन्द के पुत्र! जय जय हो उस गोपाल बालक कृष्ण की, जो कामदेव से भी अधिक मोहक हैं!
इस भजन में 9 और मिलान दिखाएँ
  • पद 4भजन
    जय ए-इ छय गोसाञीर करुम चरण बन्दन
    याहा हैते बिघ्न नाश अभीष्ट पूरण
  • पद 5भजन
    जय रस-नागरी जय नन्द-लाल
    जय जय मदन-मोहन श्री-गोपाल
  • पद 6भजन
    जय शची-सुत गौराङ्ग-सुन्दर
    जय नित्यानन्द पद्माबतीर कोँअर
  • पद 7भजन
    जय जय सीता-नाथ अद्वैत गोसाञी
    याहार करुणा-बले गोरा-गुण गा-इ
  • पद 8भजन
    जय जय श्रीबास जय गदाधर
    जय स्वरूप रामानन्द प्रेमेर सागर
  • पद 9भजन
    जय जय सनातन जय श्री-रूप
    जय जय रघुनाथ प्राणेर स्वरूप
    जय गौर-भक्त-बृन्द दया कर मोरे
    सबार चरण-धूलि धरि निज शिरे
  • पद 11भजन
    जय जय नीलाचल-चन्द्र जगन्नाथ
    मो पापिरे दया करि कर आत्म-साथ
  • पद 12भजन
    जय जय गोपाल देब भकत-बत्सल
    नब घन जिनि तनु परम उज्ज्वल
  • पद 13भजन
    जय जय गोपीनाथ प्रभु प्राण मोर
    पुरी गोसाञीर लागि यार नाम क्षीर-चोर
8 पद भजन में 8 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    राधा-नाथ बड अपरूप लीला
    किशोर किशोरी दु-इ एक मिले नबद्वीपे प्रकटिया
  • पद 2भजन
    राधा-नाथ बड अपरूप से
    श्री-चैतन्य नामे हीन-जने दया तपत-काञ्चन दे
  • पद 1अर्थ
    राधा के स्वामी अत्यन्त अद्भुत लीलाएँ करते हैं। एक किशोर और एक किशोरी एक ही रूप में मिल गए हैं, वह रूप नवद्वीप में प्रकट हुआ है।
  • पद 2अर्थ
    राधा के स्वामी अत्यन्त अद्भुत हैं। अब वे स्वयं को श्री चैतन्य नाम से पुकारते हैं। उनका रूप पिघले सोने के समान तेजोमय है। वे दीन पतित जीवों पर अत्यन्त दयालु हैं।
इस भजन में 12 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    राधा-नाथ सङ्गी अपरूप तार
    निता-इ अद्वैत श्रीबास स्वरूप राय रामानन्द आर
  • पद 4भजन
    राधा-नाथ कि कहिब तब रङ्ग
    सनातन रूप रघुनाथ लोकनाथ भट्ट-युग सङ्गे
  • पद 5भजन
    राधा-नाथ ए सब भकत मेलि
    ना कैल कीर्तन आबेशे नर्तन प्रेम-दान कुतुहलि
  • पद 6भजन
    राधा-नाथ बड अभागिया मु-इ
    से-काले थाकितु प्रेम-दाने पा-इतु केन ना करिल तु-इ
  • पद 7भजन
    राधा-नाथ बड-इ रहिल दुःख
    जनम ह-इल तखन नहिल देखिते ना पा-इनु सुख
  • पद 8भजन
    राधा-नाथ कि जानि कहिते आमि
    गौरसुन्दर दासेर भरसा उद्धार करिब तुमि
  • पद 3अर्थ
    राधा के स्वामी के अद्भुत सहचर हैं। उनके सहचरों में निताई, अद्वैत आचार्य, श्रीवास, स्वरूप दामोदर और रामानन्द राय सम्मिलित हैं।
  • पद 4अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मैं सनातन गोस्वामी, रूप गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, लोकनाथ गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी और गोपाल भट्ट गोस्वामी के साथ आपकी लीलाओं का वर्णन कैसे करूँ?
  • पद 5अर्थ
    हे राधा के स्वामी, भक्तों से मिलकर आप कीर्तन की लीलाएँ करते हैं। प्रेम में डूबकर आप नृत्य करते हैं। चारों ओर बड़ी धूम मच जाती है। आप सभी को प्रेम का दान देते हैं।
  • पद 6अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मैं अत्यन्त दुर्भाग्यशाली हूँ। मैं उस समय आपके दिव्य प्रेम के उपहार को पाने के लिए उपस्थित क्यों नहीं था?
  • पद 7अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। मैं उस समय जन्मा नहीं था। मुझे आपके दर्शन का सुख नहीं मिला।
  • पद 8अर्थ
    हे राधा के स्वामी, आपके विषय में कहने के लिए मैं क्या जानता हूँ? गौरसुन्दर दास को केवल यह विश्वास है कि आप उसका उद्धार करेंगे।
5 पद भजन में 5 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 2भजन
    जय जय रोहिणी-नन्दन बलराम
    जय जय राधा-कृष्ण स्वयं रस-धाम
  • पद 3भजन
    जय जय राधा सखी ललिता सुन्दरी
    सखीर परम श्रेष्ठ रूपेर माधुरी
  • पद 2अर्थ
    जय जय बलराम की, जो रोहिणी के पुत्र हैं! जय जय राधा-कृष्ण की, जो समस्त माधुर्य के धाम हैं!
  • पद 3अर्थ
    जय जय सुन्दरी ललिता की, जो राधा की सखी हैं! वे राधा की सखियों में सर्वश्रेष्ठ हैं। उनका रूप मधुर सौन्दर्य और माधुर्य से भरा है।
इस भजन में 6 और मिलान दिखाएँ
  • पद 5भजन
    जय जय राधानुजा अनङ्ग-मञ्जरी
    त्रि-भुबन जिनि यार अङ्गेर माधुरी
  • पद 6भजन
    जय जय पौर्णमासी बलि योगमाया
    राधा-कृष्ण लीला करान यिनि आच्छादिया
  • पद 8भजन
    जय जय रत्न-मण्डप रत्न-सिंहासन
    जय जय राधा-कृष्ण सङ्गे गोपी-गण
  • पद 5अर्थ
    जय जय अनंग-मंजरी की, जो राधा की छोटी बहन हैं! उनके रूप का मधुर सौन्दर्य और माधुर्य तीनों लोकों को भी परास्त करता है।
  • पद 6अर्थ
    जय जय पौर्णमासी की, जिन्हें मैं योगमाया ही कहता हूँ। वे बड़ी सावधानी और चतुराई से राधा-कृष्ण की लीलाओं की व्यवस्था करती हैं।
  • पद 8अर्थ
    जय जय रत्न-मण्डप और रत्न-सिंहासन की! जय जय उन गोपियों की, जो राधा-कृष्ण की सखियाँ और सहचरी हैं!
12 पद भजन में 9

जयदेव गोस्वामी · वैष्णव आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    प्रलय-पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं
    विहित-वहित्र-चरित्रम् अखेदम्
    केशव धृत-मीन-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 2भजन
    क्षितिर् इह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
    धरणि-धरण-किण-चक्र-गरिष्ठे
    केशव धृत-कूर्म-शरीर जय जगदीश हरे
इस भजन में 10 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    वसति दशन-शिखरे धरणी तव लग्ना
    शशिनि कलङ्क-कलेव निमग्ना
    केशव धृत-शूकर-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 4भजन
    तव कर-कमल-वरे नखम् अद्भुत-शृङ्गं
    दलित-हिरण्यकशिपु-तनु-भृङ्गम्
    केशव धृत-नरहरि-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 5भजन
    छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
    पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
    केशव धृत-वामन-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 6भजन
    क्षत्रिय-रुधिर-मये जगद्-अपगत-पापम्
    स्नपयसि पयसि शमित-भव-तापम्
    केशव धृत-भृगुपति-रूप जय जगदिश हरे
  • पद 7भजन
    वितरसि दिक्षु रणे दिक्-पति-कमनीयं
    दश-मुख-मौलि-बलिम् रमणीयम्
    केशव धृत-राम-शरीर जय जगदिश हरे
  • पद 8भजन
    वहसि वपुषि विशदे वसनं जलदाभं
    हल-हति-भीति-मिलित-यमुनाभम्
    केशव धृत-हलधर-रूप जय जगदिश हरे
  • पद 9भजन
    निन्दासी यज्ञ-विधेर् अहह श्रुति-जातं
    सदय-हृदय दर्शित-पशु-घातम्
    केशव धृत-बुद्ध-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 10भजन
    म्लेच्छ-निवह-निधने कलयसि करवालं
    धूमकेतुम् इव किम् अपि करालम्
    केशव धृत-कल्कि-शरीर जय जगदीश हरे
  • पद 11भजन
    श्री-जयेदेव-कवेर् इदम् उदितम् उदारं
    शृणु सुख-दं शुभ-दं भव-सारम्
    केशव धृत-दश-विध-रूप जय जगदीश हरे
  • पद 12भजन
    वेदान् उद्धरते जगन्ति वहते भू-गोलम् उद्बिभ्रते
    दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्र-क्षयं कुर्वते
    पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यम् आतन्वते
    म्लेच्छान् मूर्छयते दशकृति-कृते कृष्णाय तुभ्यं नमः
7 पद भजन में 7 पद अर्थ में

श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन

  • पद 1भजन
    राधा-नाथ देखिते लागिछे भय
    तनु-बल ह्रास आर बुद्धि-नाश कखन कि जानि हय
  • पद 2भजन
    राधा-नाथ सकलि छाडिया गेल
    दान्त आन्त गेल बधिर ह-इल नयने ना देखि भाल
  • पद 1अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मुझे देखने में भी भय लगता है। मेरे शरीर का बल बहुत कम हो गया है। मेरी बुद्धि नष्ट हो गई है। अब मैं क्या जानता हूँ?
  • पद 2अर्थ
    हे राधा के स्वामी, सब कुछ चला गया है। मेरे दाँत जा चुके हैं। मेरी पाचन-शक्ति जा चुकी है। मेरे कान ठीक से नहीं सुनते। मुझे अच्छी तरह दिखता नहीं है।
इस भजन में 10 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    राधा-नाथ तुमि से करुणा-सिन्धु
    तोमा बिना आर केबा उद्धारिबे तुमि सकलेर बन्धु
  • पद 4भजन
    राधा-नाथ आगे सब निबेदय
    मरणमय ब्याधि-ग्रस्त हय स्मरण नाहिक रय
  • पद 5भजन
    राधा-नाथ आर किछु नाहि भय
    बृषभानु-सुता-चरण-सेबने पाछे कृपा नाहि हय
  • पद 6भजन
    राधा-नाथ ए-इ निबेदयि आमि
    बृषभानु-सुता-पदे दासी करि अङ्गीकार कर तुमि
  • पद 7भजन
    राधा-नाथ ए-इ मोर अभिलाष
    निभृत निकुञ्जे निज पदे लेह ए गौरसुन्दर दास
  • पद 3अर्थ
    हे राधा के स्वामी, आप करुणा के सागर हैं। आपके बिना मेरा उद्धार और कौन करेगा? आप सभी के मित्र हैं।
  • पद 4अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मैंने आपको सब कुछ बता दिया है। अब मैं एक घातक रोग की पकड़ में हूँ। अब मुझे कुछ भी स्मरण नहीं रहता।
  • पद 5अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मुझे और किसी बात का भय नहीं है। बस यही डर है कि कहीं वृषभानु की पुत्री के चरणों की सेवा के लिए मुझे कृपा न मिले।
  • पद 6अर्थ
    हे राधा के स्वामी, मैं यह प्रार्थना आपके समक्ष रखता हूँ। कृपया मुझे स्वीकार करें। कृपया मुझे वृषभानु की पुत्री के चरणों में एक गोपी दासी बना दें।
  • पद 7अर्थ
    हे राधा के स्वामी, यही मेरी अभिलाषा है। कृपया इस गौरसुन्दर दास को एक गोपी बना दें, एक ऐसी गोपी जो किसी निर्जन कुंज में आपके चरणों के प्रेम में लीन हो गई है।
6 पद भजन में 6 पद अर्थ में 1

वैष्णव आचार्यों के और भजन

  • पद 1भजन
    मेरी पलकोँ मेँ राधा, मेरी अलकोँ मेँ राधा
    मैने माङ्ग भराइ राध नामकी
  • पद 2भजन
    मेरे नैनोँ मेँ राधा, मेरे बैनोँ मेँ राधा
    मैने बैनी गुथाइ राध नामकी
  • पद 1अर्थ
    मेरी पलकों में राधा हैं, मेरी अलकों में राधा हैं। मैंने अपनी मांग को राधा के मधुर नाम से भर दिया है।
  • पद 2अर्थ
    मेरे नयनों में राधा हैं, मेरे वचनों में राधा हैं। मैंने अपने हर वचन को राधा के मधुर नाम से गूँथ दिया है।
इस भजन में 8 और मिलान दिखाएँ
  • पद 3भजन
    मेरी दुलरी मेँ राधा, मेरी चुनरी मेँ राधा
    मैने नथनी सजाइ राध नामकी
  • पद 4भजन
    मेरे चलने मेँ राधा, मेरे हलने मेँ राधा
    कटि किङ्किनी बजाइ राध नामकी
  • पद 5भजन
    मेरे दाये बाये राधा, मेरे आगे पीछे राधा
    रोम रोम रस छाइ राध नामकी
  • पद 6भजन
    मेरे अङ्ग अङ्ग राधा, मेरे सङ्ग सङ्ग राधा
    गोपाल् बंशी बजाइ राध नामकी
  • पद 3अर्थ
    मेरी दुलड़ी में राधा हैं, मेरी चुनरी में राधा हैं। मैंने अपनी नथनी को राधा के मधुर नाम से सजाया है।
  • पद 4अर्थ
    मेरे चलने में राधा हैं, मेरे हिलने-डुलने में राधा हैं। मेरी कटि की किंकिणी राधा के मधुर नाम से बज उठती है।
  • पद 5अर्थ
    मेरे दाएँ राधा हैं, मेरे बाएँ राधा हैं। मेरे आगे राधा हैं, मेरे पीछे राधा हैं। मेरे रोम-रोम में राधा के मधुर नाम का रस छा गया है।
  • पद 6अर्थ
    मेरे अंग-अंग में राधा हैं, मेरे साथ-साथ राधा हैं। गोपाल अपनी बाँसुरी पर राधा का मधुर नाम पुकारते हैं।