नंदग्राम धाम
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श्री रामानुजाचार्य प्रणाम
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अक्षर
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गाते समय
यो नित्यम् अच्युत-पदाम्बुज-युग्म-रुक्म
व्यामोहतस् तद्-इतराणि तृणाय मेने
अस्मद्-गुरोर् भगवतो 'स्य दयैक-सिन्धोः
रामानुजस्य चरणौ शरणं प्रपद्ये
अर्थ
भगवान् अच्युत के सोने जैसे चरण-कमलों पर वे सदा ऐसे मोहित रहते थे कि बाकी सब कुछ उन्हें तिनके जैसा लगता था। करुणा के अनोखे सागर, हमारे पूज्य गुरु श्री रामानुज के चरणों की मैं शरण लेता हूँ।
इस भजन के बारे में
- ग्रन्थ
- प्रणाम मन्त्र
- भाव
- पद
- 1