राधा कुन्ड तट कुञ्ज कुटीर्
राधा-कुण्ड के तट पर, कुंज में बना कुटीर... गोवर्धन पर्वत, यमुना का तट...
कुसुम सरोवर, मानस गंगा... यमुना की विशाल लहरें...
वंशी वट, गोकुल, धीर समीर... वृन्दावन के वृक्ष, लताएँ, ताड़ के पेड़...
पक्षियों और पशुओं के समूह, वसंत की शीतल हवा... मयूर, भ्रमर, और मुरली की लीला...
वेणु बांसुरी, सींग की तुरही, गायों के पैरों के निशान, बादलों की पंक्तियाँ... वसंत, चंद्रमा, शंख, करताल...
मैं जानता हूँ कि ये सभी वस्तुएँ युगल की लीलाओं के अनुकूल हैं, और मैं जानता हूँ कि ये सब उनकी प्रेम-लीलाओं को उद्दीप्त करती हैं।
इन सबको छोड़कर मैं कहीं और नहीं जाऊँगा। यदि मैं इन्हें छोड़ दूँ, तो मैं अपना प्राण ही खो दूँगा।
भक्तिविनोद कहते हैं, "हे कान्ह! सुनिए, आपकी स्मृति दिलाने वाली ये सब वस्तुएँ ही मेरे प्राण हैं।"
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- शरणागति
- भाव
- पद
- 8
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ऑडियो के लिए आभार: इस्कॉन डिज़ायर ट्री, इस्कॉन भक्त। सभी भक्त गायकों की जय।