बुद्धिमन्त खान
नवद्वीप के वह गृहस्थ भक्त जिन्होंने प्रभु के विवाह का व्यय वहन किया
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परिचय
बुद्धिमन्त खान नवद्वीप के एक धनी गृहस्थ थे। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने श्री चैतन्य-चरितामृत में उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्ति-वृक्ष की 36वीं शाखा कहा है। ग्रन्थ बताता है कि वे प्रभु को अत्यन्त प्रिय थे और जीवन के आरम्भ से ही उनकी आज्ञा का पालन करते रहे। वे पूरी तरह महाप्रभु के नवद्वीप-काल से जुड़े हैं, अर्थात् प्रभु के सन्न्यास से पहले के गृहस्थ-जीवन के समय से। बंगाल के दो अन्य भक्तों के नाम के साथ भी 'खान' की उपाधि लगती है, लेकिन वे बुद्धिमन्त खान से अलग व्यक्ति थे। सत्यराज खान कुलीन-ग्राम के एक हिन्दू कायस्थ थे। उनके परिवार के पास यह उपाधि महाप्रभु के जन्म से दो पीढ़ी पहले से थी। सेर खान एक पठान अधिकारी थे, जिनका धर्म-परिवर्तन दशकों बाद उड़ीसा में श्यामानन्द पण्डित ने कराया। एक चौथे 'खान', बिजली खान, एक कुलीन युवा पठान थे, जिनसे महाप्रभु वृन्दावन से लौटते समय मार्ग में मिले थे। वे भी एक भिन्न परिवार, भिन्न काल और देश के बिल्कुल भिन्न भाग से थे। बुद्धिमन्त खान की अपनी कथा नवद्वीप और जगन्नाथ पुरी से बाहर कभी नहीं जाती।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| भक्तों में स्थान | महाप्रभु के भक्ति-वृक्ष की 36वीं शाखा (चैतन्य-चरितामृत, आदि-लीला 10.74) |
| निवास | नवद्वीप, बंगाल |
| सम्पत्ति | नवद्वीप के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक, अपने घनिष्ठ मित्र मुकुन्द सञ्जय के साथ |
| प्रसिद्ध सेवा | विष्णुप्रिया देवी के साथ महाप्रभु के विवाह का सम्पूर्ण व्यय व्यक्तिगत रूप से वहन किया |
| ग्रन्थ स्रोत | चैतन्य-चरितामृत, चैतन्य-भागवत, भक्ति-रत्नाकर |
| भक्ति-परम्परा | श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा सत्ययुग के राजा सुवर्ण सेन के पुनर्जन्म के रूप में पहचाने गए |
परिचय के शास्त्र प्रमाण (5)
শ্রীচৈতন্যের অতি প্রিয় বুদ্ধিমন্ত খান্ । আজন্ম আজ্ঞাকারী তেঁহো সেবক–প্রধান ॥
śrī-caitanyera ati priya buddhimanta khān
ājanma ājñākārī teṅho sevaka-pradhāna
शब्दार्थ
śrī-caitanyera: of Lord Sri Chaitanya Mahaprabhu; ati priya: very dear; buddhimanta khān: Buddhimanta Khan; ājanma: from the very beginning of his life; ājñā-kārī: follower of the orders; teṅho: he; sevaka-pradhāna: chief servant.
36वीं शाखा, बुद्धिमन्त खान, श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यन्त प्रिय थे। वे सदैव प्रभु की आज्ञा का पालन करने के लिए तत्पर रहते थे, इसीलिए उन्हें प्रभु का प्रमुख सेवक माना जाता था।
तात्पर्य से: उन्होंने विवाह-समारोह का सम्पूर्ण व्यय व्यक्तिगत रूप से वहन किया। जब भगवान चैतन्य महाप्रभु वायु-व्याधि से पीड़ित हुए, तब बुद्धिमन्त खान ने प्रभु को स्वस्थ करने के लिए आवश्यक सभी औषधियों और उपचार का व्यय वहन किया।
यही वह मुख्य श्लोक है, जो महाप्रभु के पार्षदों में बुद्धिमन्त खान का स्थान बताता है। इस पर प्रभुपाद का तात्पर्य ग्रन्थ में उनके जीवन का सबसे विस्तृत, एक अनुच्छेद का परिचय है।
শ্রীবাস, রামাই, বিদ্যানিধি, গদাধর । গঙ্গাদাস, বক্রেশ্বর, মুরারি, শুক্লাম্বর ॥ বুদ্ধিমন্ত খাঁন, নন্দন, শ্রীধর, বিজয় । বাসুদেব, দামোদর, মুকুন্দ, সঞ্জয় ॥ কত নাম লইব যত নবদ্বীপবাসী । সবারে মিলিলা প্রভু কৃপাদৃষ্ট্যে হাসি’॥
śrīvāsa, rāmāi, vidyānidhi, gadādhara
gaṅgādāsa, vakreśvara, murāri, śuklāmbara
buddhimanta khāṅ, nandana, śrīdhara, vijaya
vāsudeva, dāmodara, mukunda, sañjaya
kata nāma la-iba yata navadvīpa-vāsī
sabāre mililā prabhu kṛpā-dṛṣṭye hāsi'
शब्दार्थ
buddhimanta khāṅ: Buddhimanta Khan; kata nāma la-iba: how many names shall I mention; yata navadvīpa-vāsī: as many as are the inhabitants of Navadvipa; sabāre mililā: met with all of them; prabhu: the Lord; kṛpā-dṛṣṭye hāsi': smiling with a merciful glance.
श्रीवास, रामाई, विद्यानिधि, गदाधर, गंगादास, वक्रेश्वर, मुरारि, शुक्लाम्बर, बुद्धिमन्त खान, नन्दन, श्रीधर, विजय, वासुदेव, दामोदर, मुकुन्द, सञ्जय और अन्य सभी, जितने भी मैं नाम ले सकूँ, अर्थात् नवद्वीप के समस्त निवासी, वहाँ पहुँचे, और प्रभु ने उन सबसे मुस्कराते हुए, कृपादृष्टि से मिलकर स्वागत किया।
बुद्धिमन्त खान को उन नवद्वीप-भक्तों में नाम से गिनाया गया है जो महाप्रभु के सन्न्यास के पश्चात् उन्हें शान्तिपुर और पुरी में देखने आए थे।
বাসুদেব-দত্তের এই মুরারি-গুপ্তের আর । বুদ্ধিমন্ত-খাঁনের এই বিবিধ প্রকার ॥
vāsudeva-dattera ei murāri-guptera āra
buddhimanta-khāṅnera ei vividha prakāra
शब्दार्थ
vāsudeva-dattera: of Vasudeva Datta; ei: these; murāri-guptera: of Murari Gupta; āra: and; buddhimanta-khāṅnera: of Buddhimanta Khan; ei: these; vividha prakāra: of different varieties.
और ये सभी प्रकार के भोजन वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त और बुद्धिमन्त खान द्वारा दिए गए थे।
वृत्तान्त के बहुत बाद, रघुनाथ दास गोस्वामी के स्वयं पुरी पहुँचने के प्रसंग में, बुद्धिमन्त खान को अब भी प्रभु के लिए भोजन लाने वाले बंगाली भक्तों में गिना गया है, यह उनकी दशकों तक चलने वाली सेवा का प्रमाण है।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ २७ ॥
yat karoṣi yad aśnāsi
yaj juhoṣi dadāsi yat
yat tapasyasi kaunteya
tat kuruṣva mad-arpaṇam
शब्दार्थ
yat: whatever; karoṣi: you do; yat aśnāsi: whatever you eat; yat juhoṣi: whatever you offer; dadāsi yat: whatever you give away; yat tapasyasi: whatever austerities you perform; kaunteya: O son of Kunti; tat kuruṣva: do that; mat-arpaṇam: as an offering to Me.
तुम जो कुछ भी करो, जो कुछ भी खाओ, जो कुछ भी अर्पण या दान करो, और जो भी तप करो, हे कुन्तीपुत्र, वह सब मुझे अर्पित करके करो।
तात्पर्य से: इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को ऐसा बनाए कि वह किसी भी परिस्थिति में कृष्ण को न भूले। प्रत्येक व्यक्ति को शरीर और आत्मा के निर्वाह के लिए कुछ न कुछ कार्य करना पड़ता है, और कृष्ण यहाँ यही सुझाव देते हैं कि व्यक्ति उन्हीं के लिए कार्य करे।
यह श्लोक दिखाता है कि बुद्धिमन्त खान की व्यावहारिक, गृहस्थ-शैली की सेवा, जैसे औषधि, विवाह और भोजन का खर्च उठाना, सच्ची भक्ति है। यह विद्वत्ता या वैराग्य से कम दर्जे की भक्ति नहीं है।
तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥ ४३ ॥
tatra taṁ buddhi-saṁyogaṁ
labhate paurva-dehikam
yatate ca tato bhūyaḥ
saṁsiddhau kuru-nandana
शब्दार्थ
tatra: thereupon; tam: that; buddhi-saṁyogam: revival of consciousness; labhate: gains; paurva-dehikam: from the previous body; yatate: endeavors; ca: also; tataḥ: thereafter; bhūyaḥ: again; saṁsiddhau: for perfection; kuru-nandana: O son of Kuru.
ऐसा जन्म पाकर वह अपने पूर्वजन्म की दिव्य चेतना का पुनः स्मरण करता है, और हे कुरुनन्दन, वह पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुनः आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है।
तात्पर्य से: राजा भरत, जिन्होंने अपने तीसरे जन्म में एक सद्गुणी ब्राह्मण के परिवार में जन्म लिया, पूर्व दिव्य चेतना के पुनर्जागरण के लिए उत्तम जन्म का एक उदाहरण हैं। उनके जीवन से यह ज्ञात होता है कि दिव्य साधना अथवा योगाभ्यास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
यह भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा वर्णित राजा सुवर्ण सेन के बुद्धिमन्त खान के रूप में पुनर्जन्म की कथा के सन्दर्भ में उद्धृत किया गया है। यह स्वयं चैतन्य-चरितामृत की कोई घोषणा नहीं, बल्कि एक भक्ति-परम्परा है, किन्तु यह गीता के इसी सिद्धान्त को प्रतिबिम्बित करती है कि भक्त की साधना एक जन्म से दूसरे जन्म तक आगे बढ़ती रहती है।
अध्याय 1
व्रज-लीला के लिए वस्त्र
वह दिन जब महाप्रभु ने बुद्धिमन्त खान को नाम लेकर पुकारा और कृष्ण की अपनी लीलाओं के एक अभिनय के लिए वस्त्रों की व्यवस्था करने को कहा।

बुद्धिमन्त खान को अधिकतर उस धन के लिए याद किया जाता है, जो उन्होंने चुपचाप खर्च किया: एक विवाह का खर्च, औषधि का मूल्य, पुरी तक पहुँचाया गया भोजन। केवल एक दृश्य इस क्रम से अलग है। उसमें महाप्रभु की गृहस्थ-लीलाओं में उनकी अपनी एक सच्ची भूमिका है। यह घटना नवद्वीप में चन्द्रशेखर आचार्य के घर में हुई। वृन्दावन दास ठाकुर ने बाद में चैतन्य-भागवत में उस दिन का विस्तार से वर्णन किया।
व्रज-लीला के अभिनय का अचानक निर्णय #
अपने गृहस्थ-जीवन के इस समय तक श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों को उन प्रेम-भावों की झलक दिखाने लगे थे, जो बाद में उनके पुरी के वर्षों की पहचान बने। कीर्तन के समय वे नाचते, रोते और बाहरी चेतना खो देते थे। इस विशेष दिन उन्होंने इससे भी आगे जाने का निश्चय किया। उन्होंने तय किया कि अपने ही भक्तों को पात्र बनाकर व्रज में कृष्ण की लीलाओं के दृश्यों का अभिनय किया जाए। इसमें वे स्वयं कृष्ण की भूमिका नहीं लेंगे। वे कृष्ण की अपनी दिव्य नारी-शक्तियों, दुर्गा, लक्ष्मी और अन्य, की भूमिका निभाएँगे। यह किसी औपचारिक नाट्य-परम्परा को फिर से जीवित करना नहीं था। यह प्रेम-भाव से उठी एक प्रबल इच्छा थी, जिसे महाप्रभु उसी दिन चन्द्रशेखर आचार्य के घर पर तुरन्त साकार करना चाहते थे।
नाम लेकर दिया गया आदेश #
ऐसे आयोजन के लिए थोड़े समय में वस्त्र और सजावट चाहिए थी, और महाप्रभु ने यह काम संयोग पर नहीं छोड़ा। चैतन्य-भागवत में लिखा है कि उन्होंने सीधे पुकारा: 'बुद्धिमन्त खान! शीघ्र जाओ और वस्त्रों की व्यवस्था करो, क्योंकि आज मैं नृत्य करूँगा।' भक्ति-रत्नाकर कई पीढ़ियों बाद लिखा गया। वह इसी दृश्य को परम्परा की एक स्थापित बात की तरह लगभग वैसे ही दोहराता है। वह बताता है कि यह काम दो व्यक्तियों को सौंपा गया था: बुद्धिमन्त खान और सदाशिव पण्डित नाम के एक भक्त। सब भक्तों के सामने ऐसे काम के लिए नाम लेकर चुना जाना अपने आप में विश्वास का चिह्न था। महाप्रभु किसी अपरिचित व्यक्ति से यह काम नहीं करवा रहे थे। वे एक ऐसे गृहस्थ से कह रहे थे, जिनके बारे में वे पहले से जानते थे कि वे बिना संकोच यह काम करेंगे।
एक कार्य पर असीम आनन्द #
ग्रन्थ इस बात पर बल नहीं देता कि काम कितना कठिन था। वह उसके पीछे के भाव पर बल देता है। वर्णन है कि आदेश मिलते ही बुद्धिमन्त खान और सदाशिव ऐसे आनन्द से भरकर घर लौटे, जिसे ग्रन्थ असीम कहता है। यह किसी सेवक का बेमन से आज्ञा मानना नहीं था। यह उस भक्त की उत्सुकता थी, जिसे सेवा का अवसर मिला हो। उन्होंने घर पर बाँस और कपड़े से एक चंदोवा खड़ा किया। उसके नीचे वे अलग-अलग भूमिकाएँ निभाने वाले भक्तों को वस्त्र पहनाने लगे। लिखा है कि बुद्धिमन्त खान ने स्वयं महाप्रभु को वस्त्र पहनाए। वे वस्त्र और सजावट की सामग्री लाकर प्रभु के सामने रखते थे, ताकि नाटक ठीक वैसे ही आगे बढ़ सके जैसा प्रभु चाहते थे।
पाँच सौ वर्षों तक सुरक्षित एक छोटा-सा दृश्य #
इस प्रसंग में वैसा कोई नाटकीय मोड़ नहीं है, जैसा किसी धर्म-परिवर्तन की कथा या शास्त्रार्थ में होता है। न कोई बन्दी बनाया जाता है, न कोई शास्त्र पर वाद-विवाद करता है, न किसी का जीवन बदलता है। और ठीक इसी कारण बुद्धिमन्त खान को समझने के लिए यह प्रसंग मूल्यवान है। महाप्रभु के साथ उनके सम्बन्ध के बारे में जो कुछ भी लिखा मिलता है, वह इसी तरह की तत्परता से बना है। जिस चीज़ का खर्च उठाना था, उसका खर्च उन्होंने उठाया, और जिसकी व्यवस्था करनी थी, उसकी व्यवस्था की। वे हमेशा कहे जाते ही काम में लग जाते थे, और जहाँ तक अभिलेख बताते हैं, उन्हें कभी दोबारा कहने की आवश्यकता नहीं पड़ी। चैतन्य-चरितामृत उनके बारे में संक्षेप में कहता है कि वे आजन्म आज्ञाकारी थे, अर्थात् जन्म से ही प्रभु की आज्ञा मानने वाले। चन्द्रशेखर आचार्य के घर पर वस्त्रों और सजावट की उस एक दोपहर से अधिक सटीक उदाहरण इन शब्दों का शायद ही कहीं मिले।
इस अध्याय के शास्त्र प्रमाण (1)
महाप्रभु ने कहा: 'बुद्धिमन्त खान! शीघ्र जाओ और वस्त्रों की व्यवस्था करो, क्योंकि आज मैं नृत्य करूँगा।' आदेश प्राप्त होते ही सदाशिव और बुद्धिमन्त खान तुरन्त घर लौटे, असीम आनन्द का अनुभव करते हुए, बुद्धिमन्त वस्त्र लाकर प्रभु के समक्ष रखते।
चैतन्य-भागवत का बंगाली या IAST मूल पाठ सीधे नहीं मिल सका। इसलिए यह अंश श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ महाराज के संकलन से लिया गया है, जहाँ इसे उद्धृत किया गया है। इसे सीधे मूल ग्रन्थ के उद्धरण के रूप में नहीं दिया गया है।
अध्याय 2
एक मुसलमान के जल से छिड़काव
एक भूतपूर्व सेवक बालक नवाब बना। वर्षों बाद उसकी पीठ पर बने एक पुराने निशान को लेकर उसकी पत्नी की ईर्ष्या ने उसके पुराने स्वामी, बुद्धिमन्त खान, को अन्त में स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वार तक पहुँचा दिया।
बुद्धिमन्त खान के विषय में कही गई सब बातों में एक कथा अपने स्रोत के कारण सबसे अलग है। यह न चैतन्य-चरितामृत से आती है, न चैतन्य-भागवत से, न भक्ति-रत्नाकर से। यह स्वयं श्रील प्रभुपाद के श्रीमद्भागवत प्रवचनों से आती है। उन्होंने यह कथा कम से कम दो बार सुनाई: नवम्बर 1970 में मुम्बई में, और फिर जनवरी 1976 में नेल्लोर में। उन्होंने इसे एक जीवन्त उदाहरण के रूप में सुनाया कि हृदय के सच्चे परिवर्तन के बिना केवल विधि-विधान वाला प्रायश्चित्त कितना खोखला होता है।
एक सेवक बालक जो नवाब बना #
प्रभुपाद की कथा इस घटना से बहुत पहले शुरू होती है। बुद्धिमन्त खान के घर में सेवा करने वाले एक बालक ने एक बार कुछ धन चुरा लिया, जैसा घरेलू सेवक कभी-कभी करते हैं। उसे उस समय के सामान्य ढंग से दण्ड मिला: उसे बेंत से मारा गया, जिससे उसकी पीठ पर एक निशान रह गया। वह बालक बड़ा हुआ और बुद्धिमन्त खान की सेवा छोड़कर चला गया। वह बंगाल के मुस्लिम शासन में एक पद से दूसरे पद पर ऊपर उठता गया और अन्त में स्वयं हुसैन शाह बना। यह वही ऐतिहासिक नवाब है, जो महाप्रभु की युवावस्था के वर्षों में बंगाल पर शासन करता था। सत्ता मिलने से वह पुराना निशान मिटा नहीं, न शरीर पर और न किसी और रूप में। वर्षों बाद उसकी पत्नी, बेगम, ने उसकी पीठ पर वह निशान देखा और पूछा कि यह क्या है।
पत्नी की ईर्ष्या, पति का इनकार #
हुसैन शाह ने बिना संकोच उसे सच बता दिया। उसके पुराने स्वामी बुद्धिमन्त खान ने उसे एक सच्चे दोष के लिए दण्ड दिया था, और साथ ही हमेशा उसे पुत्र के समान माना था। उसे इसमें अपने सम्मान पर कोई कलंक नहीं लगा। लेकिन उसकी पत्नी को लगा। उसने पहले नवाब पर दबाव डाला कि बुद्धिमन्त खान को सीधे मरवा दिया जाए, ताकि कोई कभी न जान सके कि नवाब कभी एक साधारण घरेलू सेवक था। हुसैन शाह ने साफ़ इनकार कर दिया। उसने कहा कि वह व्यक्ति उसके लिए पिता के समान था, और उन्हें मरवाने की वह सोच भी नहीं सकता। तब उसकी पत्नी ने एक ऐसा उपाय सुझाया, जो उस समय के बंगाल में इसकी तुलना में लगभग छोटी बात लगती थी: उन्हें मुसलमान बना दिया जाए। प्रभुपाद बताते हैं कि उस युग में इसके लिए बस इतना ही काफ़ी था कि कोई मुसलमान अपने पात्र से किसी व्यक्ति के शरीर पर जल छिड़क दे। हुसैन शाह ने यह अपने किसी विश्वास के कारण नहीं किया। अपनी पत्नी को सन्तुष्ट करने के लिए वह सहमत हो गया और उसने अपने पुराने स्वामी पर यह करवा दिया।
एक असम्भव प्रायश्चित्त #
प्रभुपाद के वर्णन में इसके बाद की घटना दिखाती है कि बंगाल का जाति-समाज कितना कठोर हो चुका था। जल छिड़के जाने के बाद बुद्धिमन्त खान ने मान लिया कि नियम के अनुसार उनका धर्म-परिवर्तन हो चुका है। वे एक ब्राह्मण भट्टाचार्य के पास यह पूछने गए कि कौन-सा प्रायश्चित्त उन्हें फिर से शुद्ध कर सकता है। पहला उत्तर यह मिला कि उन्हें एक पूरा किलोग्राम सीसा पिघलाकर पीना होगा। यह सहन न कर पाने के कारण उन्होंने दूसरे ब्राह्मण से सलाह ली। इस ब्राह्मण ने एक और विकल्प-सा दिया, पर उससे सच्ची राहत नहीं मिलती थी: सीसे के स्थान पर एक किलोग्राम पिघला हुआ घी। इनमें से कोई भी उत्तर उस समाज में लौटने का सच्चा मार्ग नहीं था, जिसे उन्होंने वास्तव में कभी छोड़ना चाहा ही नहीं था।
महाप्रभु ने उन्हें क्या कहा #
प्रभुपाद ने 1976 में नेल्लोर में इस कथा का अधिक पूरा रूप सुनाया। उसके अनुसार बुद्धिमन्त खान ने पहले ये सब उपाय आज़माए। उसके बाद ही वे अपनी समस्या सीधे श्री चैतन्य महाप्रभु के पास लेकर गए। प्रभुपाद कहते हैं कि महाप्रभु ठीक-ठीक समझ गए कि बुद्धिमन्त खान किस प्रकार के समाज से जूझ रहे थे। उन्होंने एक बिल्कुल अलग उत्तर दिया: गृहस्थ-जीवन छोड़ दो, वृन्दावन जाओ, और वहाँ हरे कृष्ण का जप करते हुए रहो। उनके उत्तर में न पिघली हुई धातु की कोई बात थी, न पुरोहितों की किसी विधि की। यह इस संकट से भक्ति के द्वारा निकलने का मार्ग था, किसी कठोर परीक्षा के द्वारा नहीं। उसी प्रवचन में दूसरी जगह प्रभुपाद ने कहा कि ऐसी परीक्षाएँ सुधारने के लिए कम और दण्ड देने के लिए अधिक बनाई गई थीं।
इस कथा पर एक ईमानदार टिप्पणी #
यह पूरी कथा केवल प्रभुपाद के दो प्रवचनों पर आधारित है। दोनों प्रवचन श्रीमद्भागवत के एक ही श्लोक (6.1.6) पर हैं और उनके बीच पाँच वर्ष का अन्तर है। दोनों संस्करण पूरी तरह एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। 1970 का मुम्बई-प्रवचन सीसे वाले प्रायश्चित्त की माँग पर ही समाप्त हो जाता है। उसमें न घी वाले विकल्प का उल्लेख है, न महाप्रभु की सलाह का। 1976 का नेल्लोर-संस्करण अधिक पूरा है और उसमें ये दोनों बातें जुड़ी हैं। कोई भी प्रवचन साफ़ नहीं कहता कि बुद्धिमन्त खान इसके बाद सचमुच नवद्वीप छोड़कर वृन्दावन चले गए। ऐसा होना उनके जीवन के बाकी लिखित विवरण से भी ठीक से मेल नहीं खाता। उस विवरण के अनुसार ऐसा लगता है कि वे दशकों तक बंगाल में सक्रिय रहे: विवाह का खर्च उठाते हुए, वस्त्रों की व्यवस्था करते हुए और पुरी की तीर्थयात्राओं में शामिल होते हुए। प्रभुपाद ने यह कथा जैसी सुनाई, वैसी ही यहाँ दी गई है। इस कठिनाई को सुलझाने का प्रयास नहीं किया गया है, क्योंकि कोई भी उपलब्ध स्रोत इसे नहीं सुलझाता।
उपसंहार
नवद्वीप के सबसे धनी भक्त #
अपने मित्र मुकुन्द सञ्जय के साथ बुद्धिमन्त खान महाप्रभु के समय में नवद्वीप के सबसे धनी लोगों में गिने जाते थे। ये दोनों अपने धन से साधारण दान-पुण्य करते थे और नगर के निर्धनों के लिए औषधि और उपचार की व्यवस्था करते थे। यह सेवा वे बहुत पहले से करते आ रहे थे, महाप्रभु से जुड़ी किसी भी घटना में उनका नाम आने से बहुत पहले से। इसी व्यावहारिक सहायता के कारण बुद्धिमन्त खान का नाम जीवनी-ग्रन्थों में आता है। युवा निमाई पण्डित को वायु-व्याधि की शारीरिक पीड़ा होने लगी थी। यह शरीर की वायु का एक विकार था, जो उनके अपने गहरे होते प्रेम-भाव के कारण उत्पन्न हुआ था। उस समय अन्य भक्तों ने उपचार और औषधि की व्यवस्था के लिए बुद्धिमन्त खान को ही बुलाया। इस प्रकार महाप्रभु के भक्त-मण्डल के लिए वे सबसे पहले ऐसे व्यक्ति के रूप में उपयोगी हुए, जो काम को सचमुच पूरा करवा सकते थे और उसका खर्च भी उठा सकते थे। यह एक गृहस्थ की भक्ति-सेवा थी, और अपने ढंग से यह किसी विद्वान की टीका जितनी ही सच्ची थी। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं, "तुम जो कुछ भी करो, जो कुछ भी खाओ, जो कुछ भी अर्पण या दान करो, और जो भी तप करो, हे कुन्तीपुत्र, वह सब मुझे अर्पित करके करो" (भगवद्गीता 9.27)। इसी भाव से बुद्धिमन्त खान की धन और परिश्रम से की गई सेवा भी भक्ति ही थी।
प्रभु के विष्णुप्रिया के साथ विवाह का व्यय वहन करना #
बुद्धिमन्त खान का नाम सबसे अधिक एक ही सेवा से जुड़ा है। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के दूसरे विवाह का सम्पूर्ण व्यय स्वयं उठाया। यह विवाह नवद्वीप के पुरोहित सनातन मिश्र की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ था। चैतन्य-चरितामृत के जिस श्लोक में उन्हें 36वीं शाखा कहा गया है (आदि-लीला 10.74), उस पर श्रील प्रभुपाद के तात्पर्य में यह बात साफ़ कही गई है। बाद के बंगाली ग्रन्थ, जैसे भक्ति-रत्नाकर, इसे परम्परा में सबकी जानी हुई बात के रूप में दोहराते हैं। उन्होंने कितनी राशि दी या किस-किस चीज़ का खर्च उठाया, यह कहीं लिखा नहीं मिलता। केवल इतना ज्ञात है कि पूरा व्यय उन्होंने ही वहन किया। लेकिन इसी विवाह से विष्णुप्रिया देवी महाप्रभु के शेष गृहस्थ-जीवन में उनके साथ रहीं। ऐसे विवाह का अकेले पूरा खर्च उठाना कोई छोटी सेवा नहीं थी।
चन्द्रशेखर के घर में व्रज-लीला के वस्त्र #
बुद्धिमन्त खान का सबसे जीवन्त रूप से याद किया जाने वाला दृश्य एक दूसरे अवसर का है। वृन्दावन दास ठाकुर की चैतन्य-भागवत और बाद में भक्ति-रत्नाकर बताते हैं कि वे उस दिन चन्द्रशेखर आचार्य के घर में उपस्थित थे। उसी दिन महाप्रभु ने अपने भक्तों के बीच कृष्ण की व्रज-लीलाओं का एक नाटक करने का निश्चय किया। उसमें उन्होंने स्वयं दुर्गा, लक्ष्मी और अन्य दिव्य नारी-रूपों की भूमिका निभाई। महाप्रभु ने सीधे उन्हें पुकारा: 'बुद्धिमन्त खान! शीघ्र जाओ और वस्त्रों की व्यवस्था करो, क्योंकि आज मैं नृत्य करूँगा।' ग्रन्थ के अनुसार, बुद्धिमन्त खान और सदाशिव पण्डित नाम के एक भक्त तुरन्त यह काम करने दौड़ पड़े। केवल बुलाए जाने से ही उन्हें असीम आनन्द हुआ। वे वस्त्र और सजावट की सामग्री लेकर लौटे, जिससे यह नाटक हो सका। यह एक छोटी, घरेलू-सी लीला है। इसमें न कोई दर्शन है, न कोई चमत्कार। इसी कारण यह पाँच शताब्दियों से उनके नाम से जुड़ी हुई है। यह एक ऐसे भक्त को दिखाती है, जिनकी पूरी सेवा यही थी कि बुलाए जाते ही वे तैयार रहें।
प्रभु के साथ पुरी की यात्रा #
जब महाप्रभु ने कटवा में सन्न्यास लिया और सबसे पहले शान्तिपुर गए, तब बुद्धिमन्त खान भी उन नवद्वीप-वासी भक्तों में थे जो उन्हें वहाँ देखने आए। चैतन्य-चरितामृत बाद में उन 'नवद्वीप के समस्त निवासियों' में उनका नाम लेता है, जो उस अवसर पर प्रभु से आनन्दपूर्वक मिले। उनकी सेवा यहीं नहीं रुकी। चैतन्य-भागवत बताती है कि महाप्रभु के सन्न्यास के बाद वे बंगाली भक्तों की वार्षिक जगन्नाथ पुरी यात्रा में भी शामिल हुए। चैतन्य-चरितामृत बहुत बाद की एक पुरी-यात्रा का भी वर्णन करता है, जो रघुनाथ दास गोस्वामी के स्वयं पुरी पहुँचने के प्रसंग से जुड़ी है। उस वर्णन में बुद्धिमन्त खान का नाम उन भक्तों में आता है, जो वासुदेव दत्त ठाकुर और मुरारि गुप्त के साथ प्रभु के लिए तरह-तरह के भोजन लाए थे। इस प्रकार उनकी दशकों की भक्ति केवल इसी से दिखाई देती है कि हर अवसर पर उन्होंने किस चीज़ का खर्च उठाया, क्या व्यवस्था की या क्या लेकर गए। स्रोतों में एक बार भी उनके अपने शब्द उद्धृत नहीं हैं।
पूर्वजन्म में राजा सुवर्ण सेन #
एक अलग परम्परा भी है, जो पूरी तरह भक्ति-भाव से जुड़ी है। वह बुद्धिमन्त खान के महाप्रभु के मण्डल में होने का कारण उनके पूर्वजन्म में बताती है। अपने नवद्वीप-धाम-माहात्म्य में श्रील भक्तिविनोद ठाकुर लिखते हैं कि सत्ययुग में सुवर्ण सेन नाम के एक धर्मपरायण राजा थे। वे गोद्रुमद्वीप के उस गाँव पर शासन करते थे, जो बाद में सुवर्ण बिहार कहलाया। ठाकुर यह भी लिखते हैं कि नारद मुनि की कृपा से इस राजा को श्री गौरांग के प्रति गहरा प्रेम प्राप्त हुआ, जो राधा और कृष्ण का संयुक्त स्वरूप हैं। एक बार राजा ने स्वप्न में गौर और गदाधर के दर्शन किए। जागने पर वह दर्शन खो जाने से वे बहुत दुखी हुए। तब आकाशवाणी ने उन्हें बताया कि जब महाप्रभु स्वयं कलियुग में प्रकट होंगे, तब वे बुद्धिमन्त खान के रूप में फिर जन्म लेंगे और प्रभु की लीलाओं के विस्तार में सहायता करेंगे। भक्ति-भाव से की गई यह पहचान महाप्रभु के समय के कई पीढ़ियों बाद लिखी गई। यह बात चैतन्य-चरितामृत या चैतन्य-भागवत में स्वयं नहीं कही गई है। यह कथा पढ़ने योग्य है। साथ ही, ईमानदारी से यह बताना उचित है कि यह बाद में लिखी गई एक भक्ति-परम्परा है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि योग-मार्ग में अधूरे रह गए व्यक्ति को भी अगले जन्म में "अपने पूर्वजन्म की दिव्य चेतना का पुनः स्मरण हो आता है, और वह पूर्ण सिद्धि प्राप्त करने के लिए पुनः आगे बढ़ने का प्रयत्न करता है" (भगवद्गीता 6.43)। सुवर्ण सेन से बुद्धिमन्त खान तक की यह भक्ति-परम्परा की कथा भी उसी सिद्धान्त की एक प्रतिध्वनि मानी जाती है।
अभिलेखों में जो अनुत्तरित रह गया #
बुद्धिमन्त खान का जन्म-वर्ष, तिरोभाव-वर्ष या वंश किसी उपलब्ध स्रोत में दर्ज नहीं है। हमें केवल उनका नगर, उनकी सम्पत्ति, और महाप्रभु के जीवन के कई दशकों में बिखरी हुई उनकी कुछ सेवाएँ ही ज्ञात हैं। हुसैन शाह वाले प्रसंग का विवरण भी निश्चित नहीं है। प्रभुपाद ने यह कथा दो बार सुनाई, और दोनों बार के बीच पाँच वर्ष का अन्तर था। दोनों प्रस्तुतियाँ इस बात पर पूरी तरह सहमत नहीं हैं कि पुरोहितों ने क्या प्रायश्चित्त बताया या कथा का अन्त कैसे हुआ। यह प्रसंग उन जीवनी-ग्रन्थों (चैतन्य-भागवत, भक्ति-रत्नाकर) में भी बिल्कुल नहीं मिलता, जिनका उल्लेख बुद्धिमन्त खान के नवद्वीप-जीवन के लिए अन्य स्थानों पर किया गया है। इसलिए इसे वैसा ही समझना चाहिए जैसा यह है: श्रील प्रभुपाद द्वारा स्मृति से सुनाई गई एक कथा, न कि स्वयं चैतन्य-चरितामृत का कोई श्लोक। फिर भी यह सहेजकर रखने योग्य है, और इससे इसका महत्त्व कम नहीं होता।
- Sri Chaitanya-charitamrita, Adi-lila 10.74 and purport (vedabase.io)
- Sri Chaitanya-charitamrita, Madhya-lila 3.153-155 (vedabase.io)
- Sri Chaitanya-charitamrita, Antya-lila 10.9-11 and 10.121 (vedabase.io)
- Buddhimanta Khan — Gaudiya History (ISKCON Desire Tree)
- Sri Buddhimanta Khan — Shyam Das Baba (excerpted from Sri Chaitanya: His Life & Associates by Srila Bhakti Ballabh Tirtha Maharaja)
- Srimad-Bhagavatam 6.1.6 lecture, Bombay, November 6 1970 (vedabase.io)
- Srimad-Bhagavatam 6.1.6 lecture, Nellore, January 5 1976 (vedabase.io)
