वंशी दास बाबाजी के प्रारम्भिक जीवन की लगभग सारी जानकारी थोड़ी-सी बंगाली जीवनियों से मिलती है। ये जीवनियाँ उनके देहावसान के काफी समय बाद लिखी गईं, और ये हमेशा एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं। फिर भी जिन बातों पर वे सहमत हैं, उनसे उनके जीवन की एक सच्ची रूपरेखा बन जाती है: एक निर्धन परिवार, बचपन से ही गौराँग और नित्यानन्द के प्रति गहरा आकर्षण, एक विवाह जो उन्हें बाँध न सका, और अन्त में पारिवारिक जीवन से सदा के लिए अलग हो जाना।
| विवरण | वर्णन |
|---|---|
| जन्म का नाम | भैरब चन्द्र (भैरव भी लिखा मिलता है) |
| जन्म | 1859, मजिदपुर गाँव, जमालपुर, मयमनसिंह जिला (अब बांग्लादेश) |
| माता-पिता | सनातन मल्लब्रह्म (एक मछुआरा) और सर्वसुन्दरी देवी |
| परिवार में स्थान | सात संतानों में सबसे बड़े |
| पुत्र | हरचन्द्र, जिन्हें वे संसार त्यागते समय पीछे छोड़ गए |
| गुरु | विवादित, नीचे देखें |
एक निर्धन मछुआरे का घर #
उनका जन्म 1859 में मजिदपुर में हुआ, जो जमालपुर के निकट एक गाँव है। उस समय यह गाँव बंगाल के मयमनसिंह जिले में था और आज बांग्लादेश में है। वे सात संतानों में सबसे बड़े थे। उनके पिता सनातन मल्लब्रह्म मछली पकड़कर परिवार का पालन करते थे, और उनकी माता का नाम सर्वसुन्दरी देवी था। बालक भैरब चन्द्र भी परिवार के इसी काम में हाथ बँटाते थे। लेकिन मछली बेचकर लौटते समय वे पास के एक गौर-नित्यानन्द मन्दिर में रुक जाते और घंटों वहाँ खड़े होकर बस विग्रहों को निहारते रहते। वे वहाँ रहने वाले एक भक्त की संगति में भी समय बिताते थे। ये एक साधु थे, जिन्हें नरोत्तम दास बाबाजी के नाम से याद किया जाता है। इन बाबाजी से उन्होंने सोलहवीं शताब्दी के महान कवि-संत नरोत्तम दास ठाकुर के भजन सीखे। एक स्रोत के शब्दों में, उनके मन में चैतन्य महाप्रभु और नित्यानन्द प्रभु के प्रति गहरा आकर्षण भी जागा। उनके माता-पिता को चिन्ता हुई कि यह सब उन्हें कहाँ ले जाएगा। इसलिए उन्होंने छोटी आयु में ही उनका विवाह करवा दिया। बंगाल के त्यागी संतों की जीवन-कथाओं में माता-पिता प्रायः ऐसा करते हैं, और प्रायः यह उपाय सफल नहीं होता।
विवाह और संन्यास #
विवाह से भी उनका मन घर में नहीं लगा। सभी उपलब्ध स्रोत इस बात पर सहमत हैं कि अन्त में उन्होंने अपनी पत्नी और छोटे पुत्र को सदा के लिए छोड़ दिया और फिर कभी गृहस्थ जीवन में नहीं लौटे। लेकिन विवरणों में कुछ अन्तर हैं, और उन्हें छिपाने के बजाय यहाँ ईमानदारी से दिया गया है। भक्ति विकास स्वामी द्वारा संकलित एक जीवनी कहती है कि माता के बार-बार आग्रह करने पर वे केवल एक दिन पत्नी के साथ रहे, और फिर उन्हें छोड़कर चले गए। इस जीवनी के अनुसार उस समय उनका पुत्र लगभग छह माह का था। ओ. बी. एल. कपूर की द सेंट्स ऑफ़ बंगाल से लिया गया एक अलग विवरण इसके विपरीत कहता है कि जब उन्होंने संसार त्यागा, तब उनका पुत्र हरचन्द्र नौ या दस वर्ष का था। इसका अर्थ होगा कि उन्होंने पहले विवरण की तुलना में लगभग एक दशक बाद घर छोड़ा। कोई भी स्रोत इस अन्तर को नहीं समझाता, और यहाँ भी इसे सुलझाने का प्रयास नहीं किया गया है। आगे क्या हुआ, इस पर दोनों विवरण सहमत हैं। घर छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ वर्ष मजिदपुर में ही बिताए। फिर वे भारत भर में एक लम्बी तीर्थयात्रा पर गए। अन्त में लगभग 1906 में वे नवद्वीप में बस गए और वंशी दास नाम धारण किया (इसे कभी-कभी मिलाकर वंशीदास भी लिखा जाता है)।
कौन से गुरु? तीन भिन्न उत्तर #
उन्हें किसने दीक्षा दी, इस पर स्रोत अलग-अलग उत्तर देते हैं। सबसे अधिक प्रामाणिक लगने वाला उत्तर चुनने के बजाय यहाँ सभी उत्तर साफ़-साफ़ दिए गए हैं। भक्ति विकास स्वामी का संकलन कहता है कि उनके दीक्षा-गुरु वही नरोत्तम दास बाबाजी थे, जिन्हें वे बचपन से गाँव के मन्दिर में जानते थे। इसी संकलन के अनुसार इन्हीं गुरु ने उन्हें वंशीदास नाम दिया। ये नरोत्तम दास बाबाजी एक त्यागी वैष्णव साधु थे। नाम एक जैसा होने पर भी इन्हें मध्यकालीन कवि नरोत्तम दास ठाकुर के साथ एक नहीं समझना चाहिए। दूसरी ओर, ओ. बी. एल. कपूर की पहले लिखी गई जीवनी हरिलाल व्रजवासी को उनका दीक्षा-गुरु बताती है। वह रामानन्द व्रजवासी को उनका अलग वेश-गुरु बताती है (अर्थात वे गुरु जिन्होंने उन्हें औपचारिक बाबाजी वेश दिया)। ये दोनों नाम उपलब्ध स्रोतों में और कहीं नहीं मिलते। परम पूज्य भक्ति प्रमोद पुरी महाराज का एक संस्मरण एक तीसरी सम्भावना बताता है। वे भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर के शिष्य थे और वंशी दास बाबाजी को व्यक्तिगत रूप से जानते थे। वे इसे अपनी आँखों देखी बात के रूप में नहीं, बल्कि सुनी हुई बात के रूप में बताते हैं: "हमने सुना है कि वंशी दास ने हमारे परम गुरुदेव, श्रील गौर किशोर दास बाबाजी महाराज से वेश लिया था।" ये तीनों दावे एक ही घटना का वर्णन नहीं हो सकते, और कोई भी स्रोत इस विरोधाभास को नहीं समझाता। एक व्यापक बात अधिक निश्चित है, क्योंकि दो स्वतंत्र स्रोत बिना एक-दूसरे का खंडन किए इस पर सहमत हैं। वह यह है कि वे सामान्य रूप से नरोत्तम दास ठाकुर से चली आ रही गुरु-परम्परा से जुड़े थे। यह उनकी गुरु-परम्परा के बारे में एक दावा है, किसी विशेष गुरु का नाम नहीं। उनके विशेष गुरु कौन थे, इस प्रश्न को पाठक अभी भी खुला ही समझें।

