आ ओत पिरीति मूरति मय सागर
आ-ओत पिरीति मूरति-मय सागर
श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन से।
सोलह भजन, जो पिछले अध्याय के विषय, यानी नाचते चैतन्य महाप्रभु के बाहरी चित्र, से हटकर उनकी भीतरी भाव-दशाओं की ओर मुड़ते हैं: रोना, भाव में डूब जाना, आध्यात्मिक तल्लीनता में पुरी के समुद्र की ओर दौड़ पड़ना। ये बाहरी रूप से अधिक भाव, यानी भक्ति के परमानन्दमय भाव, का वर्णन करते हैं।
16 भजन
आ-ओत पिरीति मूरति-मय सागर
निज नामामृत पहुं मत्त अनुक्षण
गोरा मोर दयार अबधि गुण-निधि
सोणार बरण गोरा प्रेम-बिनोदिया
भाबाबेशे गोराचान्द बिभोर ह-इया
हरि हरि गोरा केन कान्दे
गम्भीरे भितरे गौर राय
रो-इ रो-इ जपे गोरा कृष्ण-नाम-मधु
सिंह-द्वार त्यजि गोरा समुद्र आडे धाय
चेतन पा-इया गोरा-राय
आरे आमार गौर-किशोर
सहचर-अङ्गे गोरा अङ्ग हेल-इया
सोणार बरण गौर सुन्दर
शुन-इते गौराङ्ग खेद
आरे मोर गौर-किशोर
आजु बिरह-भाबे गौराङ्गसुन्दर