जय रे जय रे गोरा श्री शची नन्दन
जय रे जय रे गोरा श्री-शची-नन्दन
गौड़ीय वैष्णव आचार्यों के भजन (नरहरि दास) से।
नयनानन्द दास की छाप वाले सात भजन, जो इस संग्रह के भरे-पूरे अध्यायों में से एक है। इनमें चैतन्य महाप्रभु का वर्णन सद्गुणों के सागर के रूप में है, और प्रश्न है कि गोलोक के स्वामी उस नित्य धाम को छोड़कर पृथ्वी पर क्यों उतरेंगे। गौर-चन्द्रिका शैली बार-बार इसी प्रश्न पर लौटती है और चैतन्य के प्राकट्य को ही अहैतुकी कृपा का कार्य बताती है।
7 भजन
जय रे जय रे गोरा श्री-शची-नन्दन
गोलोक छाडिय प्रभु केन बा अबनी
गोरा मोर गुणेर सागर
किना से सुखेर सरोबरे
आ-ओत पिरीति मूरति-मय सागर
कलि-घोर-तिमिरे गरासल जग-जन
मुख-खानि पुर्णिमार शशी किबा मन्त्र जपे