शोभामय शचीर अङ्गने
शची के सुन्दर आँगन में ब्राह्मण चारों दिशाओं को वेदों की ध्वनि से भर रहे हैं।
यह कैसा आनन्द प्रकट हुआ है? इस शुभ क्षण में भगवान् निमाईचन्द्र के अधिवास का संस्कार हो रहा है।
हर अतिथि को सुगन्धित फूलों की माला दी जाती है। भगवान् गौर के अंगों की कान्ति दिशाओं को प्रकाश से भर देती है।
सभा के बीच ब्राह्मणों के रत्न भगवान् गौर शोभामयी लीला कर रहे हैं। वे कितने करोड़ कामदेवों को परास्त नहीं कर देते!
भगवान् गौर की ओर एक बार देखते ही कोई भी अपना धैर्य नहीं रख पाता। किसी को यह भी याद नहीं रहता कि वह कौन है।
उस अधिवास में जो-जो अतिथि आया, उन सबको चन्दन-लेप, सुगन्ध और दूसरे उपहार दिए गए। सब सन्तुष्ट हैं।
विधिपूर्वक अधिवास सम्पन्न करके वल्लभ आचार्य अपने घर लौट गए।
उस उत्सव का आनन्द कहाँ जाकर समाप्त होता है, यह कहने की शक्ति किसी में नहीं है। माता शची महिमामयी हैं। उनके सब कर्म शुभ हैं।
स्त्रियाँ उपहार देती हैं। भाट कवि मंगलमय कविताएँ सुनाते हैं।
नृत्य, गीत और वाद्य के बहुत से सुन्दर प्रकार हैं। इन कार्यों की किसी और वस्तु से तुलना करने के लिए ठीक-ठीक उपमा और रूपक कहने की शक्ति किसमें है? किसी में नहीं है।
ऐसा कौन है जो “उत्तम! महिमामय!” नहीं कहता? सारा संसार “जय! जय!” की मधुर ध्वनि से भर गया है।
मनुष्यों के बीच घुल-मिलकर देवता भगवान् गौर के अधिवास का उत्सव देख रहे हैं। ऐसा यह नरहरि कहता है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 12