बल कृष्नौ बल वलित विलसौ
हे सखी, कृष्ण और बलराम उत्साह से खेल रहे हैं और उनके सखा हँस रहे हैं।
वे दोनों खेल-खेल में बछड़े की पूँछ पकड़ लेते हैं। फिर वे प्रेम भरे झगड़े में लग जाते हैं।
वे गायों की रक्षा के लिए हाथ में छड़ियाँ लिए हैं। जाते-जाते वे प्रसन्नता से हर घर की ओर देखते हैं।
वे तेज़ी से चलते बछड़ों के पीछे दौड़ते हैं और लम्बी पंक्ति में चलते जाते हैं।
उन दोनों के शरीर शरद ऋतु के वर्षा-बादलों जैसे हैं और उनकी चंचल आँखें चमकती हुई बिजली की कौंध जैसी हैं।
माथे पर गिरती घुँघराली लटों से घिरे उनके मुख ऐसे सुन्दर हैं कि भौंरों से खेलते हुए सुन्दर कमल के फूल भी उनके सामने मुरझा जाते हैं।
वे नीले और सुनहरे रंग के सुन्दर, महीन वस्त्र पहने हैं। उनके तेज़ चलते चरणों में घुँघरू झनक रहे हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- जीव गोस्वामी · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- गोपाल-चम्पू
- पद
- 7