बरज भूषण गौर बिधु बर, करि बिबाह बिनोद गति पर
विवाह की लीलाएँ पूरी हो जाने पर शोभा से सजे प्रभु गौरचन्द्र अपनी वधू के साथ घर लौटते हैं। वे अद्भुत रूप से सुन्दर और शोभायमान हैं। पालकी में बैठे हुए वे अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। उनका सौन्दर्य अमृत की उमड़ती हुई धारा के समान है। उनके अनुपम, शोभामय, सजे हुए रूप का दर्शन हर नेत्र को भर देता है। वे लोगों के हृदय मोह लेते हैं।
लोग बिना रुके “जय! जय!” पुकारते हैं। अनगिनत स्त्री-पुरुष उन्हें निहारते हैं। लोग आपस में कहते हैं: “ये दोनों देवी लक्ष्मी और भगवान् नारायण के समान शोभायमान हैं।” हृदय में आनन्द भरे कवि इस दिव्य जोड़ी की नई-नई लीलाओं का वर्णन करती मधुर स्तुतियाँ सुनाते हैं। ब्राह्मण, जो पृथ्वी पर देवताओं के समान हैं, वेदों का पाठ करते हैं। आनन्द से उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
वादक मुरज, मर्दल, त्रिसरी, कुण्डली, पटह, पुष्कल और अनेक अन्य वाद्य बजाते हैं। “कु-कु नु-नु-नु-नु-नु!” वादक-दल के वाद्य मधुर स्वर में कहते हैं। नर्तक और नर्तकियाँ अनेक प्रकार के नृत्य करते हैं। “ताधिक धिकिता धिनि! निधि धेन्ना धिकि तक!” उनके नृत्य की ताल कहती है। उनकी देह अद्भुत और सुन्दर भंगिमाओं में गतिमान है।
वादक नई-नई-नई धुनें बजाते हैं, ऐसी धुनें जो हर प्राणी के कानों को मुग्ध कर देती हैं। इन धुनों को सुनकर हिरण वन छोड़कर सज्जन रसिकों की उस सभा के पास दौड़े आते हैं। मधुर संगीत सब दिशाओं में भर जाता है और हर घर में प्रवेश करता है। वह संगीत नरहरि दास के हृदय को आनन्द से भर देता है। जिस समय गायें अपने खुरों से धूल उड़ाती हैं, उस समय विवाह की बारात सुन्दर गंगा के तट पर रुकती है और फिर प्रभु गौर के घर जाती है।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 4