Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

बरज भूषण गौर बिधु बर, करि बिबाह बिनोद गति पर

बरज-भूषण-गौर-बिधु-बर, करि बिबाह बिनोद-गति पर प्रेयसी सह चल-इ निज घर, परम अद्भुत शोहये चढल चौदल माहि झलकत, रूप अमिय प्रबाह उछलत बलित नयन शिङ्गार अनुपम, निखिल जन-मन मोहये
अर्थ

विवाह की लीलाएँ पूरी हो जाने पर शोभा से सजे प्रभु गौरचन्द्र अपनी वधू के साथ घर लौटते हैं। वे अद्भुत रूप से सुन्दर और शोभायमान हैं। पालकी में बैठे हुए वे अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। उनका सौन्दर्य अमृत की उमड़ती हुई धारा के समान है। उनके अनुपम, शोभामय, सजे हुए रूप का दर्शन हर नेत्र को भर देता है। वे लोगों के हृदय मोह लेते हैं।

होत जय जय शब्द अबिरत, नारी पुरुख असङ्ख्य निरखत परस्पर भण लखिमी लखिमीक-नाथ दुँहु बिलसत जनु बन्दी-गण मन मोद अतिशय, उचरित नब नब चरित मधुमय भूरि भूसुर करत घन घन, बेद-ध्वनि पुलकित तनु
अर्थ

लोग बिना रुके “जय! जय!” पुकारते हैं। अनगिनत स्त्री-पुरुष उन्हें निहारते हैं। लोग आपस में कहते हैं: “ये दोनों देवी लक्ष्मी और भगवान् नारायण के समान शोभायमान हैं।” हृदय में आनन्द भरे कवि इस दिव्य जोड़ी की नई-नई लीलाओं का वर्णन करती मधुर स्तुतियाँ सुनाते हैं। ब्राह्मण, जो पृथ्वी पर देवताओं के समान हैं, वेदों का पाठ करते हैं। आनन्द से उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

बाद्य बहु-बिध मुरज मुरदल, त्रिसरि कुण्डलि पटह पुष्कल कु-कु नु-नु-नु-नु-नुधा, बिबिध बायत मधुर बादक घटा नटत नर्तकी नर्तकाबली, उघटि तधिका धिकिता धिनि निधि धेन्ना धिकि तक तल धरु, पग-भङ्गी चमकत तनु छटा
अर्थ

वादक मुरज, मर्दल, त्रिसरी, कुण्डली, पटह, पुष्कल और अनेक अन्य वाद्य बजाते हैं। “कु-कु नु-नु-नु-नु-नु!” वादक-दल के वाद्य मधुर स्वर में कहते हैं। नर्तक और नर्तकियाँ अनेक प्रकार के नृत्य करते हैं। “ताधिक धिकिता धिनि! निधि धेन्ना धिकि तक!” उनके नृत्य की ताल कहती है। उनकी देह अद्भुत और सुन्दर भंगिमाओं में गतिमान है।

जाति-श्रुति स्वर-ग्राम मुरछन, तान नब नब नब आलापन शुनत कानन त्यजि मृग, गुणी-बृन्द निकटहि धाय-ए भबन चहु दिश बिपुल कल-कल, दास नरहरि हृदय उचलल समय गो-धूलि ललित सुरधुनी तीरे बिरमि घरे आय-ए
अर्थ

वादक नई-नई-नई धुनें बजाते हैं, ऐसी धुनें जो हर प्राणी के कानों को मुग्ध कर देती हैं। इन धुनों को सुनकर हिरण वन छोड़कर सज्जन रसिकों की उस सभा के पास दौड़े आते हैं। मधुर संगीत सब दिशाओं में भर जाता है और हर घर में प्रवेश करता है। वह संगीत नरहरि दास के हृदय को आनन्द से भर देता है। जिस समय गायें अपने खुरों से धूल उड़ाती हैं, उस समय विवाह की बारात सुन्दर गंगा के तट पर रुकती है और फिर प्रभु गौर के घर जाती है।

इस भजन के बारे में

रचयिता
नरहरि दास
पद
4