भजने उत्साह भक्तिते विश्वास
हे प्रभु! भजन में उत्साह, भक्ति में विश्वास, प्रेम पाने के लिए धैर्य रूपी धन, भक्ति के अनुकूल कर्मों में प्रवृत्ति, और असत् संगति का त्याग।
भक्ति के लिए उचित आचरण के ये छह गुण मुझमें कभी नहीं रहे। हे नाथ! मैं माया की संगति छोड़कर आपके चरणों की सेवा कैसे करूँ?
मैं निंदित आचरण में ही डूबा रहा और साधुओं की संगति कभी नहीं की। फिर भी साधु का वेश धारण करके दूसरों को उपदेश देता हूँ। यह माया की एक बड़ी विचित्र चाल है।
ऐसी दशा में हे हरि! मुझे केवल आपकी अहैतुकी कृपा ही मिल सकती है। श्री गुरु की शरण में रहकर मैं कब प्रार्थनापूर्वक आपको पुकारूँगा?
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- भक्तिविनोद ठाकुर · जीवनी पढ़ें
- ग्रन्थ
- शरणागति
- भाव
- पद
- 4