जे आनिलो प्रेम धन
जे आनिलो प्रेम-धन कोरुणा प्रचुर्
प्रार्थना (नरोत्तम दास ठाकुर) से।
भगवान और उनके पार्षदों के विरह से उठे विलाप का एक भजन। यहाँ फिर विरह, यानी बिछड़ना, ही मुख्य भाव है, जैसा पहले स विलाप श्री वृन्दावन वास लालसा में था। पर यहाँ यह किसी स्थान के लिए नहीं, बल्कि स्वयं भगवान के पार्षदों के लिए है।
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