कबे कृष्ण धन पाब
कबे कृष्ण-धन पाब हियार माझारे थोब
प्रार्थना (नरोत्तम दास ठाकुर) से।
चार भजन, जिनमें रचयिता फिर से मथुरा देखने को तरसते हैं। वे इस तड़प को साधारण आशा नहीं, बल्कि विरह, यानी बिछड़ने की पीड़ा, के रूप में व्यक्त करते हैं। वैष्णव साहित्य की परम्परा की तरह यहाँ भी मथुरा, वृन्दावन के साथ, कृष्ण की पृथ्वी पर की लीलाओं से जुड़ी पवित्र भूमि है।
4 भजन