जय जय अदभुत सो पहुं अद्वैत
जय जय अदभुत सो पहुं अद्वैत
श्री गौरांग और गोविन्द की महिमा में आचार्यों के भजन से।
अद्वैत आचार्य की महिमा के बीस भजन। वे पंच-तत्त्व में, यानी संकीर्तन आन्दोलन के पाँच प्रमुख स्वरूपों में, सबसे बड़े हैं। परम्परा से माना जाता है कि उन्होंने शान्तिपुर में अपनी गहन आराधना और प्रार्थना से चैतन्य महाप्रभु को प्रकट होने के लिए बुलाया। यहाँ कई भजन उन्हें सदाशिव से एक मानते हैं और भगवान शिव का अवतार कहकर पुकारते हैं। साथ में उनकी करुणा की सीधी-सादी स्तुति भी है।
20 भजन
जय जय अदभुत सो पहुं अद्वैत
जय जय अद्वैत आचार्य दयामय
जय अद्वैत दयित करुणामय
अद्वैत आचार्य गुण के कहिते पारे
श्री-अद्वैतचन्द्र भूप मोर
शान्तिपुर-पति परम सुन्दर
श्रीमद् अद्वैत मुद-सदन गुण-भूप
जय देब देब महेश्वर रूप
जय जय सीता-पति पहुं मोर
कि भाबे बिभोर मोर अद्वैत गोसाञी रे
नाचये अद्वैत प्रेम-राशि
देख अद्वैत गुणेर मणि
कि भाबे अद्वैत- चान्द अदभुत
अद्वैत गुण-मणि अबनी करु धनि
सीता-नाथ मोर अद्वैतचान्द
माघे शुक्ला-तिथि सप्तमीते अति
माघ सप्तमी शुक्ल-पक्ष शुभ-क्षण क्षण भूरि
कुबेर पण्डित अति करषित
जय जय अद्वैत अचार्य महाशय
भाबेर आबेशे रहु सीता-पति मोर पहुं