सनातन मिश्रेर भबने
सनातन मिश्र के घर जो शुभ विधियाँ हो रही हैं, उनका वर्णन भला कौन कर सकता है?
अनेक प्रकार के वाद्य सुन्दर ढंग से बज रहे हैं। आनन्द का भारी कोलाहल सब ओर उमड़ पड़ा है।
अपने बन्धु-जनों के साथ सनातन मिश्र प्रवेश करते हैं। वे अपने रत्न-समान दामाद, प्रभु गौर के साथ बैठते हैं।
उनके दामाद कितने मनोहर हैं! पालकी पर बैठे हुए वे शोभायमान हैं।
चारों दिशाओं में ब्राह्मणों और भक्तों की भीड़ है। अनगिनत अतिथि आए हैं। कोई उन सबको गिन नहीं सकता।
हाथ में हाथ थामे नेत्रहीन लोगों की टोली आती है। वे प्रभु गौरचन्द्र के सामने खड़े हो जाते हैं।
पंगु लोगों की टोली राजपथ पर आती है। वे उत्सुक मन से प्रभु गौर के शोभामय सौन्दर्य को निहारते हैं।
जिनमें चलने की शक्ति भी नहीं थी, वे भी लाठी थामे धीरे-धीरे राह पर चलकर आए।
कौन था जिसने प्रभु गौर के गुण नहीं गाए? किसके हृदय में आनन्द नहीं भर आया?
अनेक प्रकार के वाद्य अनेक छन्दों में बज रहे हैं। बालक और वृद्ध नाच रहे हैं। कोई भी शान्त नहीं है।
कितने ही सैकड़ों बड़े दीपक जगमगा रहे हैं! आकाश और धरती प्रकाश से भर गए हैं।
हर कोई आनन्दित है। अतिथि पूरे क्षेत्र में भर गए हैं।
प्रसन्न मन से सनातन मिश्र अपने दामाद को गले लगाकर घर के भीतर ले जाते हैं।
वे प्रभु गौर को एक अनुपम आसन पर बैठाते हैं। उन पर फूलों की वर्षा करते हैं। उनके चन्द्रमा के समान मुख को निहारते हैं।
सब लोग बिना रुके “जय! जय!” पुकारते हैं। वादक अपने वाद्य बजाते हैं।
सनातन मिश्र विधिपूर्वक अपने दामाद का स्वागत करते हैं। यह सब देखकर नरहरि के नेत्र शीतलता देने वाले आनन्द से भर जाते हैं।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- नरहरि दास
- पद
- 16