ए धनि मोहे ना करु आरु छन्द
हे सुन्दरी, अब मुझसे और छल मत करो; मैं जान गई हूँ, तुम श्याम-चन्द्र से मिल चुकी हो।
तुम आहें भरती हो और खिले हुए कदम्ब को निहारती हो; बार-बार तुम अपना मुख हथेली पर टिका लेती हो।
क्षण-क्षण तुम अपने शरीर को कितनी ही मुद्राओं में मोड़ती हो; तुम्हारे अंग निरन्तर कलियों जैसे रोमांच से भरे रहते हैं।
तुम अपना भाव क्यों छिपाती हो? वह छिपा नहीं रहता; तुम्हारा मुख तुम्हारे हृदय की सारी पीड़ा कह देता है।
तुम बड़े प्रयत्न से अपने चंचल नेत्रों को रोकती हो; गद्गद स्वर में तुम आधे-अधूरे बोल ही बोलती हो।
किसी बहाने से तुम अंगों को हिलाती हो, किसी बहाने से तुम्हारी आँखें राह की ओर जाती हैं; बार-बार तुम एकान्त में आती-जाती हो।
गुरुजनों का आदर और लाज दूर छूट गए हैं; गोविन्द दास कहते हैं, तुम विपत्ति में पड़ गई हो।
इस भजन के बारे में
- रचयिता
- गोविन्द दास कविराज · जीवनी पढ़ें
- पद
- 7