Vaishnava Songs
नंदग्राम धाम
नंदग्राम धाम वैष्णव भजन · nandgramdham.org/songs/hi

ए धनि मोहे ना करु आरु छन्द

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AI-निर्मित अनुवाद — समीक्षा लंबित

ए धनि मोहे ना करु आरु छन्द जानल भेटलि श्यामर चान्द
अर्थ

यह स्त्री अब किसी अन्य काम में मन नहीं लगा पाती; ऐसा प्रतीत होता है कि वह मन-ही-मन चन्द्र-सम श्याम से पहले ही मिल चुकी है।

निशसि निहारसि फूटल कदम्ब कर-तले बदन सघन अबलम्ब
अर्थ

वह दूर-दूर तक निहारती हुई गहरी साँसें भरती है; कदम्ब का फूल खिल चुका है, और उसका मुख बार-बार भारी होकर उसकी हथेली पर टिक जाता है।

क्षणे तनु मोड़सि करि कत भङ्ग अबिरल पुलक मुकुल भरु अङ्ग
अर्थ

हर क्षण उसका शरीर किसी नई मुद्रा में मुड़ जाता है; निरन्तर उसके अंगों पर रोमांच की छोटी-छोटी कलियाँ उभर आती हैं।

भाब कि गोपसि गोपत ना रह-इ मरमक बेदन बदने सब कह-इ
अर्थ

वह अपने हृदय का भाव जितना भी छिपाने का प्रयत्न करे, वह छिपा नहीं रहता; उसके हृदय की पीड़ा उसके मुख पर पूरी तरह स्वयं ही प्रकट हो जाती है।

यतने निबारसि नयनके लोल गदगद शबदे कहसि आध बोल
अर्थ

वह बड़े प्रयत्न से अपने चंचल नेत्रों को रोकती है; गद्गद स्वर में वह केवल टूटे-फूटे, अधूरे शब्द ही बोल पाती है।

आन छले अङ्ग नयन छले पन्थ सघने गतागति करसि एकान्त
अर्थ

किसी एक बहाने से उसके अंग हिलते हैं, किसी दूसरे बहाने से उसकी आँखें राह की ओर भटकती हैं; वह बार-बार अकेली ही इधर-उधर टहलती रहती है।

दूरे रहु गुरुजन-गौरब लाज गोबिन्द-दास कह पड़ल अकाज
अर्थ

गुरुजनों का आदर और लज्जा तो अब दूर ही रहें। गोविन्द दास कहते हैं, वह गहरी विपत्ति में पड़ गई है।